Live Wire News literary portal with Gulmohar and Rajnigandha flowers

मां के नाम आसुंओं से भीगी चिट्ठी

माँ की याद में लिखी गई भावनात्मक चिट्ठी दर्शाती प्रतीकात्मक तस्वीर

विजया डालमिया, प्रसिद्ध लेखिका, हैदराबाद

प्यारी माँ,

आज पहली बार ख़त के माध्यम से तुमसे दिल की बात कर रही हूँ। पहले कभी ज़रूरत ही नहीं पड़ी इस तरह से बात करने की। तुम तो हमेशा मेरा मौन भी समझ लेती थी, पर आज जब तुम नहीं हो, तो मुझे शब्दों की ज़रूरत पड़ गई है।

लरज़ते हाथों से एक शब्द लिखना चाहा मौत… और स्याही खत्म हो गई।
माँ के दिनों में, माँ, तुम चली गई। देखते-देखते एक महीना बीत गया, पर कैसे बीता? हर दिन एक-एक साल की तरह बीता। सब कुछ यंत्रवत हो रहा है. विचारों का आना, आँखों का बरसना… कहीं कोई पूर्णविराम नहीं। सिवाय इसके कि… माँ नहीं रही। अचानक से तुम तारा बन गई। ऐसी बातों के लिए हमारी कोई मानसिक तैयारी कभी नहीं होती।

माँ, तुमने सब कुछ सिखाया, पर तुम्हारे बिना कैसे रहेंगे. बस यही नहीं सिखाया। जब से गई हो, आँखों में हमेशा नमी सी रहती है। आँखें जागी-जागी, खोई-खोई सी रहती हैं। यूँ तो मैं रोई भी नहीं और वैसे तो मैं सोई भी नहीं। फिर यह एहसास—जागते हुए सोने का, सोते हुए जागते रहने का थोड़ा अजीब ही है।

ज़िंदगी में बहुत सी अजीब बातें हो रही हैं। जिस घर में तुम रहती थी, जहाँ हर कोना तुम्हारी याद से महकता है, अंतिम विदाई में उसी घर का एक कोना भी तुम्हें नसीब नहीं हुआ। आँखों में कितनी ही हसरतें लिए तुम रुख़सत हो गई किसे पता?
एक आह भरी होगी… हमने न सुनी होगी… जाते-जाते तुमने आवाज़ तो दी होगी।

हम यह अच्छे से जानते हैं कि तुम भी नहीं जानती थी कि इस तरह चली जाओगी, वरना कुछ तो हिदायतें देती जैसे देती थी जब कभी थोड़े दिनों के लिए भी कहीं जाती थी। आज एक महीना बीत गया, बिना इस उम्मीद के कि तुम कब आओगी। लंबे उदास दिन, लंबी सूनी मायूस रातें। सब एक-दूसरे से बस पूछने के लिए पूछते हैं “कैसे हो?” और जवाब वही रटा-रटाया “ठीक हूँ।”
जबकि सब जानते हैं कि अंदर से कोई ठीक नहीं है। पर सब एक-दूसरे को शब्दों से बहलाते रहते हैं, क्योंकि उन्हें अपने से ज़्यादा दूसरे की चिंता है। डरते हैं कि कहीं उनकी आँखों के आँसू दूसरे की आँखों में न आ जाएँ, क्योंकि सबका दर्द तो एक ही है।

विचारों पर कोई पूर्णविराम नहीं है, न ही आँसुओं पर। जब कभी ऐसा कुछ होता है, तो शब्दों के सुंदर खिलौनों की बाढ़ सी आ जाती है बहलाने। पर जिस तरह भूख से बिलखता बच्चा दूध पीकर ही चुप होता है, उसी तरह हम भी उन खिलौनों को दरकिनार कर बिलख रहे हैं. बार-बार उस आँचल की खुशबू को महसूस कर।
धीरज भी तो धीरे-धीरे ही आता है, ना।

वह मुसाफ़िर जो अपने सफ़र पर चला गया और अब कभी नहीं लौटेगा यह जानते हुए भी इस पर विश्वास नहीं होता। बस सोचते और सोचते रहते हैं कि माँ, तुम बिना बताए कहाँ चली गई, अचानक यूँ झटपट।

ज़िंदगी भर सिर्फ़ सबका करती रही। अंतिम समय में भी किसी से कुछ नहीं करवाया। कुछ साथ तो कुदरत के कहर ने भी दिया। कोरोना न होता तो शायद आज यह सब भी न होता। पर हम तो दर्शक मात्र हैं देखने और सहने को मजबूर।
जज़्बात अपनी जगह हैं और हक़ीक़त अपनी। पर जज़्बात छलक-छलक कर हक़ीक़त से सवाल कर रहे हैं, और जवाब में सिर्फ़ तन्हाई… आँसू।

कहने और करने में बहुत फ़र्क़ होता है, उतना ही जितना समझने और समझाने में। समझाते समय हम बहुत उदार हो जाते हैं, पर समझने के समय कोई समझ हमें समझा नहीं पाती। जाने वाले तो मिनटों में चले जाते हैं, पर यादें क्यों नहीं जातीं? शायद यादें भी हमारी ही तरह मजबूर होती हैं।

आज मेरी कहानी मेरी निहारिका में प्रकाशित हुई। माँ, देख रही है ना तू? खुश तो बहुत होगी, जहाँ भी है वहीं से देखकर। हमेशा तू दूसरों की कहानियाँ पढ़कर खुश होती रही। आज मेरी लिखी कहानी पढ़कर कैसा लगता यह ख्वाहिश ही रह गई।
तेरी वो खुशी से चमकती आँखें, तेरी मुस्कुराहट सब तेरे साथ ही चला गया। काश, मैं पहले यह सब कर पाती तो तेरे चेहरे की चमक देख पाती।

पर अब मैं तुझे देख रही हूँ दिन-रात, हर बात में, हर चीज़ में। जितनी जब तू थी तब भी नहीं थी, अब नहीं होते हुए भी हर वक्त मौजूद है। तेरी यह मौजूदगी कभी सहारा बन जाती है और कभी तोड़ भी देती है। दोनों बातें कैसे हो सकती हैं? यह सवाल बार-बार मन में आता है और मुझे थका देता है।
शायद थककर मैं सो जाऊँ इसीलिए ना? यह सब तेरी ही ट्रिक है ना, माँ? हँस मत। मैं जानती हूँ तू क्या जानना चाह रही है यही ना कि मैं अभी तक सोई क्यों नहीं? सो जाऊँगी… पहले आँखों में नींद तो आने दे। नींद के लिए उसका घर भी तो खाली होना चाहिए, क्योंकि वहाँ तो आँसुओं ने अपना घर बना रखा है। वे पहले निकलें, तब तो नींद आए।

बस आज इतना ही, माँ…

जाने वाले कभी नहीं आते,
जाने वालों की याद आती है।
हर चीज़ की ऋतु आती है,
पर जाने वालों की…कभी नहीं… कहीं नहीं।

हमारे हर हिस्से से गूँज बनकर
माँ का आशीर्वाद
हमेशा हमारे साथ चलता रहता है।

7 thoughts on “मां के नाम आसुंओं से भीगी चिट्ठी

  1. ऐसी ही होती है माँ!
    हमें जीवन की दौड़ में दौड़ना सिखाकर अपने कदम धीमे से समेट लेती हैं,और हम जान ही नहीं पाते।
    जब समझते हैं तब देर हो चुकी होती है।

    1. सच मे माँ बस माँ ही होती हैं
      माँ सा दुसरा कोई नही

    2. माँ तो मां होती है मन से बढ़कर कुछ नहीं उसकी यादें कभी नहीं जाती है ताउम्र भर

  2. माँ के लिए आपके अहसास ने मानों मेरे मन की भी पीड़ा व्यक्त कर दी… बहुत सुंदर अभिव्यक्ति 🙏

  3. यादों के भावों से परिपूर्ण अभिव्यक्ति।

  4. हर किसी के दिल की बातों को शब्द दे दिए हैं आपने .. माँ तो बस माँ होती है ।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *