देह नहीं, आत्मा का अपमान

महिला की गरिमा और मानसिक पीड़ा को दर्शाती सशक्त कविता, जिसमें बिना शारीरिक स्पर्श के की गई हिंसक दृष्टि और नजरों के अपराध को शब्दों के माध्यम से उजागर किया गया है.

सुरभि ताम्रकार, लेखिका, दुर्ग

ना मेरी कोई भूल थी,
ना हवाओं की कोई साज़िश.
ना दुपट्टे ने शरारत की,
वह तो बस चुपचाप सरक गया.

उसकी आँखें वहीं ठहर गईं,
और मेरी रूह वहीं सिमट गई.
पहले मैंने दुपट्टा संभाला,
फिर खुद को,
अपने टूटते आत्मविश्वास को.

पर वह आदमखोर हटा नहीं.
उसकी नज़र अब भी
मेरे होठों की सरहदों पर भटक रही थी.
फिर धीरे-धीरे
उसने मेरे गाल पढ़े,
मेरी आँखों में घुस आया,
और देखने के नाम पर
मुझे टुकड़ों में बाँट दिया.

ऊपर से नीचे तक,
हर हिस्से को
अलग-अलग निगलता रहा.

उसकी गंदी नज़र में
मेरे कपड़ों को मैला करने का साहस था,
पर मेरे निर्वस्त्र मन की ताक़त को
कमज़ोर करने की
हिम्मत उसमें कभी नहीं थी.

यह भी बलात्कार ही था,
बिना छुए किया गया,
और उसे बलात्कारी कहने में
मुझे कोई संकोच नहीं.

5 thoughts on “देह नहीं, आत्मा का अपमान

  1. सुरभि जी बहुत ही सटीक विश्लेषण उस नज़र का, जो चीर जाती है। और नजर ही नहीं, कई बार शब्दों के निर्लज वार भी औरत को अपमानित करने के लिए किये जाते हैं ।

  2. सुरभि जी बहुत सटीक विश्लेषण स्त्री की भावनाओं का। औरत की मर्यादा को खंडित सिर्फ शारीरिक तौर पर ही नहीं, बल्कि नजरों व शब्दों से भी किया जाता है।

  3. यथार्थ अवलोकन जो स्त्री की आत्मा को भीतर तक झकझोर जाती है। सच कहा लेखिका ने

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