
सुरभि ताम्रकार, लेखिका, दुर्ग
आपकी साँसें अब शरीर का हिस्सा नहीं रहीं।
इसकी स्वीकार्यता मुझे द्रवित करती है।
पर आपकी लेखनी जीवन का हिस्सा है।
विनोद कुमार शुक्ल जी,
आपके शब्द आज भी जीवंत हैं।
उनमें वही मंत्रमुग्धता है
पढ़कर लगता है जैसे साँसें फिर जाग उठेंगी।
आपकी रचनाएँ आपके व्यक्तित्व का ही विस्तार हैं
दीवार में एक खिड़की,
हर मौसम में छंद लिखूँगा,
नौकर की कमीज,
खिलेगा तो दिखेगा,
लगभग जय हिंद,
वो आदमी चला गया…
आप भले चले गए हों,
पर हमारे हृदय-पटल के पन्नों में
आपके विचारों का सान्निध्य बना रहेगा।
शब्द कितने सौभाग्यशाली रहे,
जिन्हें आपने साकार किया।
यह साक्षात्कार है आपकी प्रतिभा का।
हमारा दृष्टिकोण
आपको हर बार तलाशेगा।
पर नियति तो नियति है
आपका जाना शायद आवश्यक था।
कितना पीड़ादायक पल रहा होगा
आपका, आपकी कलम से दूर होना।
मेरा यह विश्वास है
कि आप फिर से अवतरित होंगे
शब्दों में, विचारों में,
और हमारी चेतना में।
