
सुरभि ताम्रकार, प्रसिद्ध लेखिका, दुर्ग
“माँ” केवल एक शब्द नहीं,
अपने आप में व्याकरण का संग्रह है।
इसे संज्ञा, सर्वनाम या किसी विशेषण तक
सीमित करना,
किसी एक अलंकार का हिस्सा बनाना,
किसी एक छंद में बाँध देना
मेरी अपूर्णताओं में से एक है।
मुझे लगता है, यह कोई खंडकाव्य भी नहीं
हो सकता,
और न ही कोई महाकाव्य
इसे सीमित कर सकता है।
माँ किसी अनंत ब्रह्मांड-सी है,
और उसकी ममता को
कुछ अलंकारों में सीमित कर देना
मेरे साहस से परे है।
मैं हर बार की तरह विवश हूँ
माँ होने, माँ-सा बनने
और माँ हो जाने के
उस अंतराल में।
मेरे लिए माँ की विशालता को
और उसकी ममता को
शब्दशः समझ पाना
मेरी समझ से परे,
अनंत की पराकाष्ठा है
जो मुझे सदा सीमित कर देती है।
बहुत सुंदर