समानता की आड़ में लुप्त होती संस्कृति

डॉ. रश्मि प्रसिद्ध लेखिका

किसी भी देश या समाज की पहचान उसकी संस्कृति से होती है। संस्कृति केवल पहनावा या खान-पान नहीं होती, बल्कि वह जीवन-दृष्टि है, जो पीढ़ियों से हमारे आचरण, मूल्यों और संबंधों को दिशा देती आई है। भारत जैसे देश की आत्मा सदियों से उसकी परंपराओं, धर्मों, भाषाओं, कला, संगीत, साहित्य और पारिवारिक मूल्यों में बसती आई है।

यह वही भारत है जहाँ ऋषि-मुनियों की तपोभूमि रही, गंगा-यमुना की पवित्र धाराएँ बहीं, काशी के घाटों ने ज्ञान दिया, अयोध्या और वृंदावन ने मर्यादा और प्रेम का पाठ पढ़ाया। यहीं गुरु गोविंद सिंह का बलिदान हुआ और यहीं इस्लाम व ईसाइयत ने भी शांति और सेवा का संदेश दिया। वेद, उपनिषद, गीता, रामायण और महाभारत केवल ग्रंथ नहीं, बल्कि जीवन जीने की कला हैं। फिर भी आज प्रश्न उठता है क्या हम अपनी इस सांस्कृतिक विरासत को भूलते जा रहे हैं?

आज “समानता” और “स्वतंत्रता” जैसे शब्दों की बहुत चर्चा है, पर समस्या तब उत्पन्न होती है जब इन शब्दों को जिम्मेदारी से अलग कर दिया जाता है। यह लेख न तो स्त्री-पुरुष के बीच अधिकारों की समानता के विरोध में है और न ही शिक्षा, सम्मान और अवसरों में बराबरी पर प्रश्न उठाता है। समानता निस्संदेह आवश्यक है, परंतु समानता का अर्थ अनुशासनहीनता या मूल्यों का त्याग नहीं हो सकता।

दुर्भाग्यवश आज कुछ महिलाएँ और लड़कियाँ स्वतंत्रता को केवल मनमानी समझने लगी हैं। विचारों की स्वतंत्रता को शरीर-प्रदर्शन, नशे, रिश्तों की अस्थिरता और सामाजिक मर्यादाओं की अवहेलना से जोड़ दिया गया है। जब कोई यह कहता है “यह मेरी पर्सनल लाइफ है, आपको क्या फर्क पड़ता है?”तो यही प्रश्न समाज के सामने खड़ा होता है कि क्या व्यक्तिगत आचरण का समाज से कोई संबंध नहीं होता?

सच्चाई यह है कि हर व्यक्ति समाज का दर्पण होता है। हमारे व्यवहार का प्रभाव हमारे परिवार, बच्चों और आने वाली पीढ़ियों पर पड़ता है। जब घरों में संवाद, संयम और दायित्व कम होते जाते हैं, तो रिश्ते कमजोर पड़ने लगते हैं। विवाह जैसे पवित्र बंधन आज केवल उत्सव और प्रदर्शन बनकर रह गए हैं, जहाँ कर्तव्य और समर्पण पीछे छूटते जा रहे हैं। “एंजॉयमेंट” को जीवन का लक्ष्य मान लिया गया है। परिणामस्वरूप पारिवारिक कलह, अकेलापन, बच्चों में असमय परिपक्वता और भावनात्मक अस्थिरता बढ़ रही है।

मीडिया, विज्ञापन और डिजिटल कंटेंट भी इस भ्रम को और गहरा कर रहे हैं, जहाँ नैतिक सीमाओं को सामान्य दिखाया जा रहा है। यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि संस्कृति का अर्थ रूढ़िवाद नहीं है। संस्कृति वह संतुलन है, जहाँ स्वतंत्रता और मर्यादा साथ-साथ चलती हैं। भारतीय संस्कृति ने कभी स्त्री को कमजोर नहीं माना, बल्कि उसे शक्ति, विद्या और सम्मान का प्रतीक माना है। परंतु उस सम्मान के साथ कर्तव्य, संयम और गरिमा को भी समान महत्व दिया गया।

यहाँ समानता की बात अमीर-गरीब या छोटे-बड़े के संदर्भ में नहीं, बल्कि स्त्री और पुरुष के बीच संतुलन की है। इतिहास गवाह है कि देश की महिलाओं ने कितने संघर्ष और बलिदान से स्वतंत्रता और अधिकार प्राप्त किए। स्वतंत्रता का अर्थ कभी भी विचारहीन आचरण नहीं रहा। स्वतंत्रता विचारों और अधिकारों की होती है, न कि मर्यादाओं के पूर्ण त्याग की।

जब समाज में यह तर्क दिया जाता है कि “मेरी मर्जी, मेरी आज़ादी”, तब यह समझना आवश्यक है कि हर व्यक्ति की गतिविधियाँ समाज और संस्कृति को प्रतिबिंबित करती हैं। घर-परिवार में दिए गए संस्कार ही आगे चलकर समाज की दिशा तय करते हैं। यदि परवरिश में दायित्व, सेवा और अनुशासन का भाव नहीं होगा, तो उसका असर पारिवारिक और सामाजिक ताने-बाने पर अवश्य पड़ेगा।

आज विवाह को भी केवल फैशन, फन और एंजॉयमेंट तक सीमित कर दिया गया है। कर्तव्य, धैर्य और जिम्मेदारी जैसे मूल्य पीछे छूटते जा रहे हैं। पहले विवाह एक सामाजिक और नैतिक बंधन होता था, आज वह केवल आयोजन और दिखावे तक सिमटता जा रहा है। आधुनिकता के नाम पर प्री-वेडिंग वीडियो, सोशल मीडिया प्रदर्शन और अनावश्यक दिखावा बढ़ गया है, जबकि विवाह के वास्तविक अर्थ और जिम्मेदारियाँ समझने की प्रवृत्ति कम होती जा रही है।

बच्चों के मानसिक विकास पर भी इसका प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है। आज छोटे बच्चों के सामने ऐसे दृश्य और विज्ञापन परोसे जा रहे हैं, जिनके लिए वे मानसिक रूप से तैयार नहीं होते। वेब सीरीज़, फिल्मों और विज्ञापनों के माध्यम से संस्कृति का जो स्वरूप प्रस्तुत किया जा रहा है, वह चिंता का विषय है।

आज आवश्यकता इस बात की है कि हम समानता और स्वतंत्रता को संस्कृति के विरोधी नहीं, बल्कि उसके पूरक के रूप में समझें। आधुनिक बनना गलत नहीं है, परंतु अपनी जड़ों से कट जाना घातक है। यदि हम सच में एक सशक्त, सभ्य और संतुलित समाज चाहते हैं, तो हमें स्वतंत्रता के साथ जिम्मेदारी को भी अपनाना होगा।

संस्कृति हमें बाँधती नहीं, बल्कि दिशा देती है। जो समाज अपनी संस्कृति को भूल जाता है, वह चाहे जितना भी आधुनिक क्यों न दिखे .अंदर से खोखला हो जाता है।

यह लेख किसी की भावनाओं को ठेस पहुँचाने के उद्देश्य से नहीं लिखा गया है, बल्कि समानता के नाम पर समाज और परिवार की बिगड़ती स्थिति की ओर ध्यान आकर्षित करने का प्रयास है।

One thought on “समानता की आड़ में लुप्त होती संस्कृति

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *