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समानता की आड़ में लुप्त होती संस्कृति

समानता और स्वतंत्रता आज के समय के आवश्यक मूल्य हैं, परंतु जब इन्हें जिम्मेदारी और सांस्कृतिक मर्यादाओं से अलग कर दिया जाता है, तब समाज में असंतुलन पैदा होता है। भारतीय संस्कृति स्वतंत्रता के विरोध में नहीं, बल्कि संतुलन, संयम और कर्तव्य के साथ जीवन जीने की सीख देती है। आधुनिकता तभी सार्थक है जब वह अपनी जड़ों से जुड़ी रहे। संस्कृति हमें बाँधती नहीं, बल्कि सही दिशा देती है और जो समाज अपनी संस्कृति को भूल जाता है, वह भीतर से खोखला हो जाता है।

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