खामोशी का बोलता सफर

विजया डालमिया, प्रसिद्ध लेखिका, हैदराबाद

ट्रेन के कंपार्टमेंट का जैसे ही दरवाजा खुला एक जानी पहचानी खुशबू ने सौरव का ध्यान आकर्षित कर लिया। कंपार्टमेंट में प्रवेश करने वाले की पीठ उसकी तरफ थी। वह सामान रखने में मशगूल थी। सौरव उस खुशबू में खोकर उसे देखने की कोशिश में लगा था, तभी वह पलटी ….ओह मेरा अंदाजा सही था…. सोचते हुए सौरव ने हल्की सी उसकी तरफ मुस्कान फेंकी, पर वह अपने सामान को सेट करते रही। हालांकि सामान ज्यादा कुछ था नहीं, किंतु शायद वह आज भी…. वही अकड़ …वही तेवर… सौरव मन ही मन बुदबुदाया व अपनी जगह से उठकर उसके सामान को सेट कर दिया। उसने आंखों ही आंखों से धन्यवाद कहा।
… आज भी वही जादू… उतना ही नशा। इन्हीं आंखों पर तो वह मर मिटा था।

अब वह बैठ चुकी थी एक खामोशी दोनों के बीच पसरी थी।
आज पूरे 20 साल बाद दोनों आमने-सामने थे। जब बिछड़े थे तब सोचा नहीं था कि कभी यूं मिलेंगे। उसने अपना सर खिड़की पर टिका दिया ।आंखें बंद की किंतु मन में यादों की खिड़की खुल गई थी….. खट… खट…… क्या है ? क्यों खटखट
कर रही हो?… अरे जल्दी चलो।… कहां?… चलो तो… कह कर उसने हाथ पकड़ा और खींच कर ले गई वहाँ जहाँ
दो नन्हे खरगोश बैठे थे। …देखो कितने खूबसूरत हैl है ना…… हां बिल्कुल, तुम्हारी तरह……कुछ भी मत बोलो…
… और नहीं तो क्या ? बिल्कुल तुम्हारी तरह देखते हैं मासूमियत से… सुमन खिलखिला कर हंसते हुए कहने लगी… सच! यह हम दोनों ही तो हैं। इनकी तरह हम हमेशा साथ-साथ रहेंगे… कहकर मेरा हाथ उसने कसकर पकड़ लिया।

तभी सुमन की चूड़ियां खनकी जैसे उससे शिकायत कर रही हो। सौरभ ने मन ही मन कहा… मैं जानता हूं ।तुम्हारी शिकायत वाजिब है, पर मैं हालात के आगे मजबूर था।
सुमन ने अपनी बोझिल पलकें उठाकर उसे देखा। उसकी आंखों की कोरों में नमी सी महसूस हुई, जिसे देखते ही सौरभ के दिल में भीतर ही भीतर कुछ होने लगा। अचानक उसे छींक आई। सौरभ मन ही मन बोला… अब तो यह लगातार पांच बार छींकेगी।हुआ भी वही। सौरभ ने अपना रुमाल उसकी तरफ बढ़ाया ,तभी उसने खुद के पर्स में से रुमाल निकाल लिया। किंतु सौरव का रुमाल देखकर वह चौंक गई… आज भी वही रुमाल… वही स्टाइल… तुम तो जरा भी नहीं बदले सौरव…बस मेरे लिए ही बदल गए….
… बदली तो तुम भी नहीं….
दोनों एक दूसरे के मौन को सुनकर समझ रहे थे।

सौरव को पता था उसकी जिंदगी में फिर कभी यह पल नहीं आयेंगे। वह जी भर के सुमन से बात कर लेना चाहता था। चाहती शायद सुमन भी थी पर उसकी नाराजगी आड़े आ रही थी।… किंतु अब तक वह नाराज है। क्या उसे मेरी बेबसी पता नहीं? क्या वह नहीं जानती कि मैं….
ठीक है। नाराज ही रहो। मुझसे बात ना करो।तभी …चाय… चाय कहता हुआ चाय वाला आ गया। सौरव ने इशारे से दो चाय कही व पर्स में से पैसे निकाल कर देने लगा। तभी सुमन ने आगे बढ़कर अपने पर्स में से खुद की चाय के पैसे दे दिए। सौरव कुछ ना कह सका। मायूसी के साथ पैसे पर्स में रख लिए। उसका चाय पीने का मन नहीं हुआ। तभी जैसे सुमन ने कानों में कहा…. ठंडी चाय अच्छी नहीं लगेगी। चलो, देखते हैं पहले कौन कंप्लीट करता है…. और उसने कप फटाफट मुंह से लगा लिया। किंतु हर बार की तरह जीत सुमन की ही हुई। पर क्या वह यह कभी जान सकेगी कि उसकी आंखों में खुशी की चमक देखने के लिए ही तो मैं हर बार…. मन ही मन उसने एक आह भरी और खाली कप नीचे रख दिया। सुमन ने विजयी अंदाज में उसे देखते हुए कहा… मैं फिर जीत गई।
पहली बार उसे समझ आया कि मौन की भाषा के साथ बातें करना इतना खूबसूरत हो सकता है। तभी सुमन ने अपनी सीट पर पैर रखकर फैलाए। उसके पांव में लगा अलता उसे उस होली की याद दिला गया जब होली पर गुलाल के पानी से उसके
पैर गुलाबी हो गए थे, तो वह देखता ही रह गया था। ठीक आज भी उसकी नजर उसके पांव से हट ही नहीं रही थी। सुमन ने शर्मा कर अपने पांव साड़ी के भीतर समेट लिए।

गालों पर हल्की लाज की लाली आज भी उसे खूबसूरत बना रही थी। काश! सुमन तुमने मुझे चुना होता…… पर तुमने तो मेरा इंतजार ही नहीं किया सौरव ।जैसा तुम चाहते थे वही मैंने किया… दोनों के मौन संवाद जारी थे।दिल ने जाने क्या समझा दो आंसू टपक पड़े सौरव की आंखों से अपनी बेबसी पर। वह क्यों सुमन के घर वालों की जिद के आगे झुक गया… तुम सुमन को क्या दे पाओगे? है ही क्या तुम्हारे पास? अगर तुम्हें सुमन से सच्चा प्यार है तो तुम यहां से कहीं दूर चले जाओ।हम उसे समझा देंगे। इसी में सुमन की बेहतरी है।

… सुमन सच में आज भी तुम मुझसे हर चीज में बेहतर हो। तभी ट्रेन थम गई।सुमन ने अपना सामान उठाया, उसे देखा और
आंखों की नमी छुपाते हुए कंपार्टमेंट का दरवाजा जोर से बंद कर दिया। ना उसने कुछ कहा ना मैंने। पर दोनों ने बहुत कुछ सुना। मेरा सब कुछ उसी के साथ चला गया। ट्रेन में वही खुशबू फैली थी और संवाद अभी भी मौन में चल रहे थे…..

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