भरत जैन देश का सबसे अमीर भिखारी

1.4 करोड़ के घर और 7.5 करोड़ की संपत्ति

सुरेश परिहार, लाइव वॉयर न्यूज, पुणे

मुंबई- देश में गरीबी और संघर्ष की कहानियां आम हैं, लेकिन मुंबई में रहने वाले भारत जैन की कहानी पूरे देश को चकित कर देती है| देश के सबसे अमीर भिखारी के तौर पर पहचाने जाने वाले भारत जैन की अनुमानित संपत्ति लगभग ७.५ करोड़ रुपये बताई जाती है| दशकों तक मुंबई के सीएसटी और आजाद मैदान के आसपास भीख मांगने वाले इस व्यक्ति ने अपनी कमाई से न सिर्फ करोड़ों की संपत्ति खरीदी, बल्कि अपने परिवार को आर्थिक सुरक्षा भी दी|
भिखारी, जिसकी संपत्ति कई अधिकारियों से ज़्यादा
मुंबई की तेज़ रफ्तार जिंदगी के बीच एक साधारण-सा दिखने वाला व्यक्ति रोज़ एक ही जगह पर बैठा दिखता है| राहगीर उसे आम भिखारी समझकर आगे बढ़ जाते हैं, लेकिन उसी व्यक्ति के पास १.४ करोड़ रुपये के फ्लैट और ७.५ करोड़ की नेटवर्थ है|
कठिन परिस्थितियों से शुरू हुआ जीवन
भारत जैन एक बेहद गरीब परिवार में पैदा हुआ. घर में इतनी तंगी थी कि पढ़ाई तो दूर, भोजन और कपड़ों की जरूरतें भी मुश्किल से पूरी होती थीं. कम उम्र में ही जिम्मेदारियॉं बढ़ीं और उनके पास कोई कौशल या नौकरी न होने से भीख मांगना ही जीवन का सहारा बन गया| मुंबई के व्यस्त इलाकों में बैठने से जैन को रोज़ 2000 से 2500 रुपये तक मिल जाते थे|
यानी:मासिक आय: 60000 से 75000 रुपये है.
यह आंकड़ा कई सफेदपोश कर्मचारियों की आय से अधिक है| लेकिन असली बात यह थी कि जैन ने इस आय को खर्च नहीं किया. बल्कि बचाया, योजना बनाई और धीरे-धीरे पैसे को संपत्ति में बदल दिया|
फुटपाथ से करोड़ों की संपत्ति तक पहुँचने की यात्रा
लंबे समय तक की गई बचत से भरत जैन ने शानदार निवेश किए.
मुंबई में दो फ्लैट जिनकी कुल कीमत लगभग 1.4 करोड़ रुपये है| ठाणे में दो दुकानें जिनसे उन्हें लगभग ३०,००० रुपये मासिक किराया मिलता है| इन निवेशों ने उन्हें वह आर्थिक स्थिरता दी, जो एक आम मध्यमवर्गीय परिवार वर्षों की नौकरी के बाद पाता है|
बेटे उसकी राह पर न चलें
भरत जैन विवाहित हैं और उनके दो बेटे हैं, दोनों ने अपनी पढ़ाई पूरी कर ली है| बचपन में शिक्षा न मिलने का दर्द उन्होंने अपने बच्चों को नहीं दिया| आज उनका परिवार संपन्न और सुरक्षित है|तो फिर करोड़पति होकर भीख क्यों? यह सबसे सामान्य और चौंकाने वाला सवाल है| परिवार ने कई बार उन्हें भीख में बैठना बंद करने को कहा| फिर भी वे रोज़ की तरह सीएसटी या आजाद मैदान पहुँच जाते हैं.
40 साल की आदत, उन्हीं स्थानों से भावनात्मक जुड़ाव
अपने जैसे लोगों का साथ, दिनचर्या का सुरक्षित और परिचित ढर्रा, मन का लगाव, भले ही पैसों की ज़रूरत न हो. उनकी कहानी बताती है कि काम और पहचान हमेशा पैसे से तय नहीं होते, कई बार यह आदत और भावना का हिस्सा बन जाते हैं्|यह सिर्फ एक अनोखी कहानी नहीं, बल्कि शहरी भारत के कई सचों का आईना हैजहॉं सामाजिक सुरक्षा कम है, विकल्प सीमित हैं, और लोग अपने तरीके से संघर्ष करते हुए आगे बढ़ते हैं. भारत जैन की सफलता भीख को रोमांटिक नहीं बनाती, लेकिन यह दिखाती है कि संसाधनहीन स्थितियों में भी समझदारी, बचत और धैर्य क्या कर सकते हैं.

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