मैं तुमसे मिलना चाहती हूँ… बस एक बार

रक्षा उपाध्याय, प्रसिद्ध लेखिका, इंदौर

आज अमर और सुहानी ने एक क़ैफे में मिलने का तय किया था…अमर आज किसी कारण से सुहानी के शहर आया हुआ था.
अमर और सुहानी पहली बार मिलने वाले थे…..अमर ने सुहानी से कई बार मिलने की रिक्वेस्ट की थी. शायद वैसे ही कह दिया करता था, क्योंकि वो भी जानता था.कि सुहानी उससे नहीं मिलेगी. और मिले भी क्यों? लेकिन इस बार सुहानी ने ही अमर से मिलने के लिए कहा था. अमर बहुत खुश हुआ, जब सुहानी ने कहा-अमर, मैं भी एक बार आपसे मिलना चाहती हूँ.अमर ने हैरानी में पूछा- सच में तुम मिलोगी मुझसे? सुहानी ने मुस्कराकर कहा-हाँ, एक बार तो मिलना ही चाहिए अमर जी आपसे. आप भी मुझे देखकर तसल्ली कर लीजिए कि रील और रियल में बहुत फर्क होता है. शायद तब जाकर आपके सर से मेरी खूबसूरती का भूत उतर जाएगा.

और दोनों हँस दिए. मिलने की वजह ये नहीं थी कि कोई रोमांटिक रिश्ता बनाना था.बस ये न रह जाए कि एक अच्छे इंसान से मिलने का मौक़ा था और हवा में उड़ा दिया. यही सोचकर सुहानी मिलने आई थी.हमेशा अजनबी लोग बुरे नहीं होते.और अजनबी तो अब थे भी नहीं. अमर और सुहानी सालों से एक-दूसरे से जुड़े हुए थे सोशल मीडिया के ज़रिये. ये दोस्ती पुरानी थी, बहुत खास थी, भरोसे वाली थी.. क्योंकि इसमें कोई स्वार्थ नहीं था स़िर्फ साथ था. इस ज़माने में जहाँ लोग बिना मतलब बात नहीं करते, दोस्ती में भी लाख रखते हैं
वहाँ ये दोनों तो बस दो-चार दुख-सुख की बातें करके ही खुश थे. अमर के लिए सुहानी उसके अँधेरे जीवन में एक रोशनी थी.
वो अकेला था सुहानी के आने से उसे एक साथी मिला.जिससे वो दिल की बातें कर सके. सुहानी अपनी ज़िंदगी में बहुत व्यस्त थी
लेकिन अमर से बातें करके उसे हमेशा अच्छा लगता था. कला और संस्कृति की रूचि दोनों के बीच बात करने को इतने विषय दे देती थी कि बातों का सिलसिला कभी थमता ही नहीं था.
और इन दोनों ने कभी एक दूसरे के जीवन में झाँकने की कोशिश भी नहीं की जिसने जो बताया, पूरे विश्वास के साथ अपना लिया.और यही तो होती है सच्ची दोस्ती.जहाँ भरोसा इतना गहरा हो कि किसी और चीज़ की ज़रूरत ही न रहे.
अमर ने कई बार पूछने की कोशिश की थी.कि सुहानी उसके लिए क्या महसूस करता है. लेकिन सुहानी अमर जी को दिल से दोस्त मानती थी. हाँ, दिल के एक कोने में अमर के लिए एक जगह जरूर थी.वो प्यार नहीं था. एक अलग भाव था
जैसे गुरु की होती है, एक आदर्श की होती है,एक मार्गदर्शक की होती है. सुहानी यह भी जानती थी कि अमर उससे कितना प्यार करता है, कोरोना के समय बहुत महीनों तक दोनों के बीच कोई बातचीत नहीं हुई. एकदिन अचानक अमर ने सुहानी को बताया कि वह कोरोना पॉजीटिव हो गया था.. उसे क्वारंटाइन किया गया है.. यह सुनकर सुहानी बैचेन हो गई. उसने उस समय अमर की दूर रहकर भी हौसला दिया. उस समय अकेले अमर को इतना अच्छा महसूस हुआ कि वह उसे मन ही मन प्यार करने लगा… लेकिन सुहानी के मन में ऐसा कुछ भी नहीं था.. लेकिन वह जानती सब थी… अमर ने जाने-अंजाने सुहानी के टूटे सपनों में फिर से जान भर दी थी.ये बात वो खुद भी नहीं जानता था. सुहानी अपने के दिनों में बहुत अच्छी कलाकार थी
लिखना, चित्रकारी करना और संगीत उसे बहुत पसंद थी, फोटोग्राफी और किताबों का शौक था. फिर ज़िंदगी आगे बढ़ गई
शौक पीछे छूट गये.एक इच्छा मन में ही रह गई.. कुछ सपने अधूरे रह गए.अमर ने सुहानी को चित्रकारी के लिए किया. बार-बार पूछता ..कुछ बनाया?कुछ बनाओ..अपनी पेंटिंग भेजो. और कब सुहानी के अंदर का पुराना चित्रकार फिर से जी उठा
ये उसे खुद भी नहीं पता चला.उसने फिर से ब्रश और कैनवास उठा लिए.एक दिन अमर जी ने एक की तस्वीर भेजी जिसमें सुहानी की बनाई हुई एक तस्वीर सजी थी.नीचे नाम लिखा था.सुहानी.सालों पहले जो नाम वो पीछे छोड़ आई थी आज उसी नाम को अमर ने एक आर्ट गैलरी तक पहुँचा दिया सुहानी अमर को मिलकर उनका शुक्रिया अदा करना चाहती थी
और एक वादा करना चाहती थी..वो वादा.. जो अमर सुहानी से हमेशा कहते थे …मेरे साथ रहना…
किसी भी तरह… छोड़ के मत जाना…ये रिश्ता जो भी था जैसा भी थापर दोनों के दिलों के क़रीब था. अमर जी के लिए सुहानी रोशनी थी. और सुहानी के जीवन में अमर एक ज्योति था ..अमर ज्योति..

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