रक्षा उपाध्याय, प्रसिद्ध लेखिका इंदौर
प्यार किसी भी उम्र में दस्तक दे सकता है. किशोरावस्था में भी अधेड़ उम्र में भी और बुढ़ापे में भी. इसमें अपराध क्या है? प्यार कभी उम्र से बँधता थोड़े है.
रमेश मुंबई में अकेले रहते थे. पत्नी पहले ही साथ छोड़ गई थी और बच्चे विदेश जाकर अपनी दुनिया में खो चुके थे. अकेले रहते हुए भी उन्होंने खुद को सँभाल रखा था. सुबह की वॉक, वापस आकर ब्रेकफास्ट बनाना, पुराने गीतों में डूब जाना, पौधों में नई कोपलों को ढूँढना फिर थोड़ा लिखना. उनका घर इतना चमकता था जैसे वहाँ कोई भरापूरा परिवार रहता हो. सच तो ये कि रमेश का अकेलापन भी बहुत सलीके वाला था.
उसी सुबह की वॉक में कई सालों से अर्चना जी मिल जाया करती थीं. हल्की मुस्कान, दो-चार शब्द और दोनों अपने रास्ते निकल जाते. उन छोटी-सी मुलाकातों ने भी दोनों के अंदर एक अजनबी-सा अपनापन बो दिया था.
फिर अचानक कई दिन बीत गए अर्चना जी दिखीं ही नहीं.
रमेश को बेचैनी होने लगी.उस सुबह उन्होंने सोचा नहीं, आज पूछ लेना चाहिए.पूछते-पूछते वे अर्चना जी के घर पहुँचे. दरवाज़ा खुला..अर्चना जी मुस्करा उठीं. वो मुस्कान जैसे इतने दिनों बाद किसी ने उसके मन पर जमी धूल हटा दी हो.
अंदर बैठते ही रमेश की आँखों में चिंता थी.उन्होंने धीरे से पूछा-सब ठीक है? अर्चना जी ने धीमी आवाज़ में कहा-बेटी-दमाद आए हुए थे दो दिन पहले वापस गए हैं बस मन नहीं हुआ बाहर जाने का.
आवाज़ में रूँआसी थकावट थी.वो कहीं अंदर टूट-सी गई थीं.
रमेश ने हल्की मुस्कान से कहा-बच्चे अब हमारे नहीं रह जाते, अर्चना जी. उनकी अपनी दुनिया हो जाती है. हम अपने लिए क्यों शर्माएँ? उदास मत होइए चलिए, आज मेरे साथ चलिए.
उस एक लाइन में हम का अहसास था.वो हम पहली बार बोला गया था.धीरे-धीरे ये मिलना बढ़ता गया. वॉक, चाय, ग़ज़लें, रेसिपी और दो अकेले जीवनों में धीरे-धीरे एक नई धड़कन लौट आई. जब रमेश की तबीयत थोड़ी बिगड़ी, तो अर्चना जी ने बिना थके पूरी देखभाल की. कभी उनके घर खाना बनता, कभी रमेश के यहाँ.
जैसे दो ज़िंदगियाँ फिर से अर्थ लेने लगी हों.उनके बच्चे भी इस दोस्ती को समझते थे.उम्र के इस पड़ाव में भी, एक-दूसरे को सहारा देते हुए देख उन्हें भी राहत मिलती थी.
फिर एक दिन…
रमेश अर्चना के घर पहुँचे.उन्होंने अर्चना का हाथ अपने हाथों में लिया और बहुत धीमे, बहुत भरे हुए स्वर में कहा-अर्चना जी, क्या आप अपना बुढ़ापा मेरे साथ बिताएँगी?दुनिया क्या कहेगी, ये मत सोचिए.हम दोनों एक-दूसरे के साथ खुश रहते हैं
हमारे अपने हमारे साथ नहीं हैं तो हम ही एक-दूसरे के अपने क्यों न बन जाएँ?अर्चना की आँखें नम हो गईं.कुछ पल बाद उन्होंने बस सिर हिला दिया.बच्चों ने भी इस रिश्ते को स्वीकार कर लिया.
और यूँ दो अधूरी ज़िंदगियों ने अपने जीवन के अंतिम अध्याय में एक नई किताब शुरू कर दी…
रक्षा जी, बहुत सुंदर भावना । समाज में इस परिवर्तन की आवश्यकता है।