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दरिया और किनारा

मंजूलता, प्रसिद्ध लेखिका, नोएडा

कल-कल, छल-छल करती मस्ती में बढ़ती हुई दरिया,
पर्दादारी करती, अपना भेद छुपाती, ऊपर-ऊपर हँसती।
किनारों पर पड़ी सब कुछ समेटती,
सब के पापों को समेटते हुए अपनी पवित्रता को बनाए रखते हुए, द्रुत गति से बढ़ती जाती।
हज़ार बाधाओं से टकराते बढ़ती जाती,
नहीं भूलती किनारों को चूमना,
उससे संवाद करना,
फिर अपने गंतव्य तक जाकर समंदर की बाहों में समा जाना।

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