
कीर्ति राणा, वरिष्ठ पत्रकार, इंदौर
शासकीय महाविद्यालय खाचरौद से हाल ही में रिटायर हुए साहित्यकार डॉ प्रदीप सिंह राव से रतलाम में गुरुवार को लंबी मुलाकात हुई। यह तो उनका एक परिचय है। दूसरा जो इससे महत्वपूर्ण परिचय है वह यह कि 1983 में करीब एक साल तक दैनिक भास्कर इंदौर में सिटी डेस्क पर हमने साथ में खबरों के लिए दिन-रात एक किये हैं, फिर चाहे अनंत चतुर्दशी वाली रात झांकियों की रिपोर्टिंग हो, साम्प्रदायिक दंगों में झुलसता इंदौर, सामाजिक मुद्दे आधारित खबरें, इंदौर के श्मशानघाटों से हर शाम तक जितने लोगों का दाह संस्कार हुआ, उनके नाम पते सहित जानकारी जुटाने-छापने का महत्वपूर्ण दायित्व रमेश जी (बड़े भाई साब) ने खास तौर पर प्रदीप को सौंप रखा था।
रतलाम गए तो थे भाई धर्मेंद्र सिंह सोलंकी की माताजी (हमारी काकीसा) के शोक कर्म में शामिल होने। वहीं से भाई प्रदीप को फोन लगाया कि घर पर हो..? मैं यहां के बाद घर आ रहा हूं। जाहिर है उनके लिये ये अप्रत्याशित खुशी जैसा ही था। हमारे पास भी (इंदौर वाली ट्रेन आने तक) चार घंटे थे। कभी हम साथ साथ रिपोर्टिंग करते इंदौर में साइकिल से जिन सड़कों को नापते थे, इन चार घंटों के दौरान उन सड़कों-चौराहों से जुड़ी उस वक्त की घटनाओं को याद करने के साथ ही तब और अब की पत्रकारिता में आए बदलाव पर अफसोस और आश्चर्य भी व्यक्त करते रहे।

यह भी याद किया कि जब विजय नगर क्षेत्र में किराए के मकान में रह रहे प्रदीप के मकान पर जाता था उनका पुत्र पुरु दो-ढाई साल का था, बाद में बेटी पूर्वा का जन्म हुआ।वो जब अपनी हजारों खबरों-रिपोर्टिंग का डिजिटलाईजेशन करने की जानकारी दे रहे थे तो मुझे मन ही मन अफसोस हो रहा था, मैंने कहा भी कि ये अक्ल मुझ में थी ही नहीं। मेरे पास तब से अब तक की खबरों की कतरन का तुम्हारे जैसा कलेक्शन नहीं है। प्रदीप का कहना था तुमने अपनी किताब (किस्से कलमगिरी के) में कितने कुछ तो घटनाक्रम लिखे हैं।
करीब चार घंटे हम बतियाते रहे, वक्त का पता ही नहीं चला। इस बीच उषा भाभी तीन चार बार चाय ले आईं, नाश्ते से ज्यादा हम उन दिनों की खबरों को लेकर जुगाली करते रहे। स्टेट प्रेस क्लब के वार्षिक पत्रकारिता महोत्सव में तो हमारी मुलाकात होती ही रहती है लेकिन 42 साल बाद यह लंबी मुलाकात थी जिसमें मीना, प्रदीप और मैंने सब्जी मंडी वाले डॉ डीएस राव, उनके पुत्र डॉ शेखर राव से लेकर डॉ सुदामा शर्मा, सुरेंद्र सिंह मुन्ना के निवास पर मेरे लिये लड़की देखने जाने के प्रसंग से लेकर कवि स्व गिरवरसिंह भंवर, प्रवीण खारीवाल, डॉ वेदप्रताप वैदिक से प्रदीप की निकटता और चेतन काश्यप का कांग्रेस से भाजपा में आना, शिवराज सिंह चौहान द्वारा हिम्मत कोठारी के बदले काश्यप को रतलाम से चुनाव लड़ाने के लिए राजी करने में प्रदीप की भूमिका, उनके द्वारा शुरु किए चेतना अखबार को रतलाम में स्थापित करना, ऋषि कुमार शर्मा, रमेश मिश्रा चंचल और उस दौर के कई कॉमन परिचितों और उनकी स्मृतियों के हम पन्ने पलटते रहे। प्रदीप का यह संकल्प प्रेरित करने वाला है कि एक साल में एक किताब लिखता ही हूं।

प्रदीप ने अपनी विदेश यात्राओं के किस्से भी सुनाए, यह कहना कि विदेश यात्रा जरूर करना चाहिए तब हम अपने देश को और बेहतर तरीके से समझ सकते हैं। बच्चों की तरक्की के साथ छोटे भाई और उससे पहले इस भाई के बेटे की दर्दनाक मौत का झकझोर देने वाला घटनाक्रम भी बताया। प्रदीप और उषा भाभी रात यही रुकने का आग्रह करते रहे, हमने अपनी मजबूरी बताई तो वो दोनों सत्कार सामग्री लेकर आ गए। हम ना ना करते रहे लेकिन सम्मान भी कर डाला कि तुम सब पहली बार तो घर आए हो।

बेजोड़,,,,कीर्ति जी की कलम का ही जादू है,वो लेखनी के सरताज हैं