पत्रकारिता को धर्म की तरह धारण करने वाले पत्रकार दिनेशचंद्र वर्मा

पांचवी पुण्यतिथि पर विशेष

मुकेश कबीर , सुप्रसिद्ध राष्ट्रकवि एवं व्यंग्यकार

विनायक फीचर्स के संस्थापक स्वर्गीय दिनेश चंद्र वर्मा एक ऐसा नाम हैं जिन्होंने आदर्श पत्रकारिता को ना सिर्फ परिभाषित किया बल्कि ताउम्र उसे जिया भी। पत्रकारिता उनके लिए सिर्फ व्यवसाय नहीं बल्कि धर्म थी। उन्होंने पत्रकारिता को ऐसा धारण किया था कि यह उनके कृतित्व ही नहीं बल्कि व्यक्तित्व में भी झलकती थी। यहां तक कि एकदम अजनबी भी पहली नज़र में ही समझ लेता था कि वे पत्रकार हैं। वैसे वे हमारे चाचा थे, लेकिन हम उनके लेखन के कारण उनके करीब आए। हम बचपन में उन्हें आचार्य रजनीश कहते थे क्योंकि उनका व्यक्तित्व और चेहरा, ख़ासकर आँखें, बिल्कुल रजनीश जैसी ही थीं—वैसी ही सम्मोहक और किसी को भी मोहित करने वाली। उनके लंबे बाल उनकी पहचान बन चुके थे। लेकिन इन सबके अलावा जो सबसे बड़ी बात थी, वह थी उनकी विद्वत्ता। ऐसी अद्भुत विद्वत्ता अब कहीं देखने को नहीं मिलती, फिर चाहे पत्रकारिता जगत हो या साहित्य जगत।

उन्हें हर विषय की इतनी गहरी जानकारी थी कि जब वे बोलते तो ऐसा लगता जैसे उस विषय के प्रोफेसर हों। प्राचीन इतिहास पर तो इतना कमांड था कि बड़े-बड़े इतिहासकार भी उनसे सलाह मशविरा करते थे। बहुत से ब्यूरोक्रेट्स उनके शोधपूर्ण लेख न केवल पढ़ते थे बल्कि रिकॉर्ड के लिए भी उपयोग करते थे।

चाचा पढ़ने के बेहद शौकीन थे। उनके तकिये के पास हमेशा बहुत सी किताबें रखी होती थीं। अगर अन्य विद्वानों से विचार-विमर्श में विवाद की स्थिति बनती, तो वे तुरंत संबंधित विषय की किताब खोलकर पुष्टि कर देते थे। उन्हें पेज नंबर भी याद रहता था, इसलिए तुरंत वही पेज खोल लेते थे।

मैं अक्सर मेरे बड़े भाई योगीराज योगेश जी (कंसल्टिंग एडिटर, आईएनडी 24 चैनल) के साथ चाचा के घर जाया करता था। जब भी हम घर जाते, तो चाचा किताबों में ही खोए रहते थे। हमेशा पढ़ते हुए ही मिलते थे, चाहे वह कोई किताब हो या समाचारपत्र। वे भारत के हर अखबार की भाषा, शैली और विषय भी जानते थे, इसलिए हर अखबार और पत्रिका में उनके लेख पहली बार में ही स्वीकार कर लिए जाते थे।

उनका लेखन इतना व्यापक था कि सत्तर और अस्सी के दशक के सभी अखबार और मैगजीन में उनके लेख छपते थे। तब कोई ऐसी मैगजीन नहीं होती थी जिसमें उनका लेख या रिपोर्ट न छपती हो। उनके मित्र कहते थे कि “आँख बंद करके कोई भी मैगज़ीन ले आइए, वर्मा जी का लेख जरूर मिलता है।”

शुरुआत में वे भूभारती के ब्यूरो चीफ थे, लेकिन धर्मयुग, सरिता, मुक्ता, कादम्बिनी, माया और अवकाश जैसी मैगज़ीन भी उनसे लेख की डिमांड करती थी। यही कारण था कि वे स्वतंत्र पत्रकारिता में रहकर भी काम के मोहताज़ नहीं रहे। अन्य लोगों के लिए स्वतंत्र लेखन में जीवन यापन मुश्किल होता था, वहीं चाचा के पास बहुत सी मैगजीन का एडवांस पेमेंट आ जाता था और विषय भी बता दिया जाता था अगले अंक के लिए।

अस्सी और नब्बे के दशक में चाचा देश के सबसे व्यस्त स्वतंत्र पत्रकार थे। इसका फायदा यह था कि उनका आत्मविश्वास बहुत उच्च था और कोई भी उन पर दबाव नहीं डाल पाता था। चाहे कोई मंत्री हो या अधिकारी, सभी उनसे झुककर ही मिलते थे। अधिकांश मंत्रियों से उनके बहुत घनिष्ठ संबंध होते थे, इतने घनिष्ठ कि शासन और प्रशासन की अंदरूनी बातें भी उन्हें बहुत पहले पता चल जाती थीं।

मोतीलाल वोरा जी जब उत्तर प्रदेश के राज्यपाल बने, तो उन्होंने तीन महीने पहले ही बता दिया था कि वोरा जी यूपी जाने वाले हैं। उनका राजनीतिक आकलन भी कभी गलत साबित नहीं हुआ। वे किसी भी कैंडिडेट या पार्टी के हारने-जीतने की घोषणा चुनाव से पहले ही कर देते थे, जो हमेशा सही निकली। यहाँ तक कि मध्यप्रदेश में 2018 के विधानसभा चुनाव में जब शिवराज सिंह चौहान और बीजेपी की लहर बताई जा रही थी, तब चाचा ने कमलनाथ के जीतने की बात कह दी थी, जिस पर तब किसी को यक़ीन नहीं हो रहा था, लेकिन आखिर में कमलनाथ जी ही मुख्यमंत्री बने।

चाचा ने उस दौर में पत्रकारिता शुरू की थी जब पत्रकारिता का अर्थ धन कमाना नहीं बल्कि नैतिकता और विद्वत्ता होता था। तब देश में कोई सबसे तेज बढ़ता अखबार जैसी बात नहीं थी, बल्कि सारे अखबार बड़े होते थे। अखबारों की प्रतिष्ठा उनकी बिल्डिंग से नहीं बल्कि खबर और लेख से होती थी। तब पत्रकार और साहित्यकार में ज्यादा फर्क नहीं होता था।

धर्मवीर भारती और आर. के. करंजिया जैसे संपादक होते थे, जो सरकारों को झुकाने की ताकत रखते थे। ऐसे निडर पत्रकारों की संगति का ही चाचा पर प्रभाव था। तब साप्ताहिक अखबारों का रुतबा आज के टीवी चैनलों से ज्यादा था। इसलिए चाचा ने अपना साप्ताहिक वचनबद्ध शुरू किया, जो विदिशा जिले का प्रतिनिधि अखबार था और प्रदेश के भी प्रतिष्ठित साप्ताहिकों में शुमार था। आज भी यह साप्ताहिक सफलता पूर्वक प्रकाशित हो रहा है। यह सिर्फ अखबार ही नहीं बल्कि ऐसी धरोहर है, जिसे चाचा ने अथक मेहनत और पसीने से सींचा है।

यह वचनबद्ध ही है जो हर सप्ताह मित्रों और परिजनों को चाचा की मधुर स्मृतियाँ प्रदान करता है। आज चाचा की पुण्यतिथि है। विनम्र श्रद्धांजलि, सादर नमन।

2 thoughts on “पत्रकारिता को धर्म की तरह धारण करने वाले पत्रकार दिनेशचंद्र वर्मा

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *