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माँ शैलपुत्री

सुनीता मलिक सोलंकी, मुजफ्फरनगर (उप्र)

प्रथम शैलपुत्री देवी,
आज नवरात्र में कृपा बरसाए माँ।
भक्तों ने सारे तेरे मंदिर सजाए माँ।।

पहला दिन शैलपुत्री स्वरूप,
पर्वतराज हिमालय की पुत्री तू।
पूर्व जन्म में राजा दक्ष की थी पुत्री,
तब माँ का नाम पड़ गया था सती।।

तेरी महिमा सारी कह न सके माँ,
भक्तों ने सारे तेरे मंदिर सजाए माँ।।

सती का विवाह शंकर संग,
दक्ष यज्ञ में सती हुई भस्म।
अगले जन्म में शैलपुत्री माँ,
पार्वती, हेमवती तेरे नाम माँ।।

देवताओं के गर्व भंजन किए माँ,
भक्तों ने सारे तेरे मंदिर सजाए माँ।।

नवदुर्गा में प्रथम पूजित हो,
महत्त्व शक्तियाँ अनंत धरो।
मूलाधार चक्र साध जागृत,
साधना करते होकर स्थिर।।

बिन माँगे ही सब देती जाए माँ,
भक्तों ने सारे तेरे मंदिर सजाए माँ।।


माँ ब्रह्मचारिणी

शिव को पति रूप में पाने, करने लगी तपस्या।
थी गिरिराज की पुत्री, थी पार्वती कहलाया।।

नाम ब्रह्मचारिणी था, बस खाती फल-फूल,
शाक-सब्जी ही खाकर, थे सौ वर्ष बिताए।।

और अंत में तो माँ का निर्जल था उपवास,
कैसे-कैसे किए तप, बिल्व पत्र भी खाए।।

उनका भी त्याग किया, तन माँ का क्षीण हुआ,
कठिन तपस्या से तो माँ अपर्णा कहाए।।

ऋषि-मुनि हो प्रसन्न, दे रहे हैं वरदान,
शिव को पति रूप में, पार्वती अपनाए।।

ब्रह्मचारिणी की कृपा, सर्वत्र सिद्धि भक्तों की,
संकट सभी दूर हों, ब्रह्मचारिणी माय।।

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