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फूलों की माला, हवा का राग”

अमृता राजेंद्र प्रसाद, धरमपुरा, जगदलपुर (छत्तीसगढ़)

हर्षित धरा, हर्षित है अंबर।
कोहरे की हुई विदाई,
देख-देख भौंरे और तितली
कली-कली मुस्काई।

दहके-दहके हैं पलाश,
लगी कानन में आग।
पुरवाई गाने लगी, है बसंती राग।

नई कोंपलें लगी पहनने
हरे-हरे परिधान,
पीली-पीली सरसों की
सजने लगी दुकान।

गेहूँ और चने की, झूमने लगी है बाली।
डाल-डाल पर कोयल काली,
कूक रही मतवाली।

लटका रखें अमलतास ने
हैं डाली पर झूमके,
स्वागत में ऋतुराज के
लगा रहे सब ठुमके।

लिए हाथ फूलों की माला,
प्रीत खड़ी है द्वार।
सारी धरती को हुआ
है बसंत से प्यार।

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