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घर…

मैंने अपना घर किसी ईंट-पत्थर की दीवारों पर नहीं, बल्कि एक मधुर, दर्दभरी और सुरीली तान पर बनाया है। यह महज़ चार दीवारें और एक छत नहीं, बल्कि ऐसा स्थान है जहाँ भोर से लेकर संध्या और संध्या से रात तक संगीत बहता है। यहाँ संवाद की स्वतंत्रता है, त्याग और समर्पण का अहसास है, और रिश्तों के मौन बंधन भी। इस घर में पंछियों की चहचहाहट, पेड़ों की हरियाली, तितलियों के रंग और मिट्टी की गंध बसी है। यहाँ प्राणवायु संचार करती है और नादब्रह्म विचरता है। यह रंगों और सुगंधों से भरा, मिट्टी और खुले आसमान से जुड़ा एक निरामय संसार है।

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फूलों की माला, हवा का राग”

“हर्षित धरा, हर्षित अंबर, कोहरे की विदाई, भौंरे और तितलियों की मुस्कान। दहकते पलाश, हरे-हरे परिधान, पीली सरसों की सजती दुकान। गेहूँ और चने की झूमती बाली, कोयल की मतवाली कूक। अमलतास की झूलती डालियाँ, फूलों की माला लिए प्रीत खड़ी है द्वार पर—सारी धरती बसंत से प्यार में डूबी हुई।”

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