
सीमा राय, प्रसिद्ध लेखिका, मधुरिमा, लखनऊ
आजकल के लेखक साहित्यिक चमत्कार कर रहे हैं… वो अपने पूरे जीवनकाल में 20 कहानियाँ लिखकर उन 20 कहानियों को अलग-अलग 6 पुस्तकों में मिलाकर छपवा ले रहे हैं। और सबसे बड़ी बात, हर पुस्तक में 5 कहानियाँ कॉमन होती हैं!
मज़े की बात यह है कि उन्हें यह साहित्यिक चमत्कार करना आता है… और ऐसे लोग वरिष्ठ साहित्यकार कहलाते हैं… क्योंकि उनके खाते में खूब सारी किताबों के नाम होते हैं… और अगर तब भी उन्हें वरिष्ठ नहीं माना जाता है तो वे जल्दी-जल्दी बालकथा या कविता की पुस्तक लिखना शुरू कर देते हैं… क्योंकि बालकथा-कविता की पुस्तक 20–25 पेज या 40 पेज से ज़्यादा की नहीं होती है… ऐसे में उनके खाते में किताबों की संख्या दिन पर दिन चमत्कारिक रूप से बढ़ती चली जाती है… इसके बाद मजाल क्या कि कोई उन्हें वरिष्ठ साहित्यकार न कहे… इतनी किसकी हिम्मत!
और अगर इतने से भी लाभ नहीं होता है तब वे एक नया काम करना शुरू कर देते हैं — एक संस्था बनाते हैं और देश भर के तमाम साहित्यकारों को बुलाकर सम्मानित करते हैं… ताकि वे साहित्यकार उनकी तारीफ़ के क़सीदे पढ़ें… और उनके साहित्य की भूरि-भूरि प्रशंसा करें। इन तमाम दाँव-पेंच के बाद भी अगर उन्हें वरिष्ठ साहित्यकार नहीं कहा जाता है तब वे कुछ राजनीतिक लोगों से साँठ-गाँठ करते हैं और तमाम राजनीतिक मंचों पर नज़र आने लगते हैं… न्यूज़ चैनलों से अपने इंटरव्यू प्रसारित करवाते हैं… तमाम अख़बारों में अपनी तारीफ़ के क़सीदे छपवाते हैं। तब जाकर उनकी आत्मा को संतुष्टि मिलती है और वे मुस्कुराते हुए अपनी पीठ थपथपाते हैं कि — अब तो मैं वरिष्ठ साहित्यकार हो ही गया।
इसके बाद वे तमाम साहित्यिक मंचों पर नज़र आने लगते हैं… जिन साहित्यिक आयोजनों में उन्हें मंच नहीं मिलता, वहाँ वे जाना पसंद नहीं करते… और भूले-भटके अगर किसी आयोजन में उन्हें मंच मिल भी जाता है तो वे उस मंच पर अपने तमाम साहित्यिक मित्रों को भी बिठा देना चाहते हैं ताकि लोग उनके समाज को साहित्यिक योगदान की भूरि-भूरि प्रशंसा करें।
साहित्य में तमाम चमत्कार होते हैं… कुछ चमत्कार तो ऐसे भी हैं कि एक ही कहानी को तीन अलग उपन्यासों में अलग-अलग नाम से छाप दिया जा रहा है… यह चमत्कारिक तरीका है साहित्यिक उत्पादन बढ़ाने का। बस कहानियों को अदल-बदल कर दो, और नई पुस्तक तैयार… एक ही उपन्यास का मैटर तीन अलग जगह छपवा दो, बस तीन उपन्यास तैयार… और सबसे अच्छी बात यह है कि सभी अलग-अलग पुस्तकें हैं! यह चमत्कार करने की हिम्मत इसलिए हो जाती है कि वह व्यक्ति यह सोचता है कि किसी भी पाठक के अंदर वह हिम्मत नहीं है कि वह उसकी सारी किताबें एक साथ खोलकर देखेगा… इसलिए वह जीवन में कभी जान ही नहीं पाएगा कि उन्होंने लेखन तो बहुत थोड़ा ही किया है… जिसमें बहुत कुछ तो इधर-उधर का चुराकर जोड़कर प्रस्तुत किया गया है, पर उसको अलग-अलग तरीके से प्रस्तुत करके किताबों की संख्या बढ़ा दी गई है।
ऐसे लेखक की साहित्यिक प्रतिभा को देखकर लगता है कि वे साहित्य की परिभाषा ही बदल देंगे। अब साहित्यिक उत्पादन की गणना कहानियों की संख्या से नहीं, बल्कि पुस्तकों की संख्या से होगी।
और सबसे बड़ी बात, ऐसे महानुभाव के पाठक भी बहुत भाग्यशाली होंगे — उन्हें एक ही कहानी / एक ही उपन्यास को 5–6 बार पढ़ने का अवसर मिलेगा, अलग-अलग शीर्षक से… अगर वे सभी किताबें खोलेंगे तब, और हर बार उन्हें लगेगा कि यह नई कहानी है या नया उपन्यास।
