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हिंदी दिवस: मातृभाषा की मौन पीड़ा

हिंदी मेरी कविता के भाल की बिंदी है, जिसने हर प्रसंग में मेरा साथ निभाया और सहज-सरल भाषा से मेरे गीतों को ढाल दिया। लेकिन यह पीड़ा भी साथ है कि अंग्रेज़ों से मिली आज़ादी के बाद भी हम अंग्रेज़ी के ग़ुलाम बने बैठे हैं। मातृभाषा की दुर्दशा देखकर दिल रो उठता है। हिंदी मस्तक की अट्टालिका से औंधे मुँह गिरती दिखाई देती है और अंतर्मन चीत्कार कर उठता है कि जिस देश को अथाह परिश्रम से आज़ादी मिली, वहाँ हिंदी का तिरस्कार क्यों? यह कैसी विडंबना और कैसी बर्बादी है!

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साहित्यिक चमत्कार

हित्य में अब चमत्कारों की कोई कमी नहीं रही। कुछ लेखक तो इतने पारंगत हो गए हैं कि बीस कहानियों को छह अलग-अलग पुस्तकों में बाँटकर छाप देते हैं—हर पुस्तक में पाँच कहानियाँ कॉमन! और जब यह भी कम पड़ता है तो बालकथा और कविता की पतली-पतली किताबें छपवाकर अपने खाते में पुस्तकों की संख्या बढ़ा लेते हैं।पाठक भी भाग्यशाली होते हैं—उन्हें एक ही कहानी पाँच–छह बार, अलग-अलग शीर्षकों से पढ़ने का अवसर मिलता है।

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