कभी बेटों के इंतज़ार में बेटियों की कतारें,
तो कभी गर्भ में बेटियों को मरते देखा है।
समानता का दावा करते इस समाज का दोहरा चेहरा देखा है।
बलात्कारियों का बचाव, उनका स्वागत,
और पीड़िता को कटघरे में सवालों से जूझते देखा है।
समानता का दावा करते इस समाज का दोहरा चेहरा देखा है।
दहेज के लिए सताई, जलाई जाती हैं बेटियां,
फिर भी माता-पिता को समझौते की समझाइश देते देखा है।
समानता का दावा करते इस समाज का दोहरा चेहरा देखा है।
हज़ारों बेटियां मारी जाती रहीं,
पर कुछ बेटों की मौत पर छाती पीटते, घबराते, डरते देखा है।
समानता का दावा करते इस समाज का दोहरा चेहरा देखा है।
अपनी बेटियों के लिए सारी खुशियाँ खोजते,
पर बहुओं को ताने देते, बेटों को उकसाते देखा है।
समानता का दावा करते इस समाज का दोहरा चेहरा देखा है।
बेटियों को घर की इज़्ज़त का पाठ पढ़ाते हुए,
बेटों के लफंगेपन पर ठहाके लगाते और बढ़ावा देते देखा है।
समानता का दावा करते इस समाज का दोहरा चेहरा देखा है।
बहू पर हाथ उठाते बेटों पर गर्व करते मुस्कुराते,
और कहते – “वह तो मार खाने लायक ही है” – ऐसे ताने देते देखा है।
समानता का दावा करते इस समाज का दोहरा चेहरा देखा है।
कपड़ों को कारण बताकर छेड़खानी और बलात्कार समझाते,
पर मासूम बच्चियों के बलात्कार पर चुप रहते देखा है।
समानता का दावा करते इस समाज का दोहरा चेहरा देखा है।
धर्म के नाम पर पत्नी, बहू, बेटी, बहन को आश्रम भेजते,
ढोंगियों के झाँसे में सब कुछ गंवाते देखा है।
समानता का दावा करते इस समाज का दोहरा चेहरा देखा है।
अपने ही घर में सुरक्षित कहाँ है बेटी और बहू,
संपत्ति की लड़ाई में उनका शोषण होते देखा है।
समानता का दावा करते इस समाज का दोहरा चेहरा देखा है।
रिश्तों की आड़ में बेशर्मी से अनाधिकार स्पर्श,
और सम्मान के नाम पर महिलाओं को चुप करवाना देखा है।
समानता का दावा करते इस समाज का दोहरा चेहरा देखा है।
शादी के बाद लड़कियां नौकरी करेंगी या नहीं,
जिससे रिश्ता भी नहीं जुड़ा, उनका फ़ैसला करते देखा है।
समानता का दावा करते इस समाज का दोहरा चेहरा देखा है।
बेटियों से कहते – “उड़ो, तुम आज़ाद हो”,
और धीरे से उनके पंख कतरते देखा है।
समानता का दावा करते इस समाज का दोहरा चेहरा देखा है।
घर को सँवारती, संभालती गृहलक्ष्मी का उपहास उड़ाते,
और कहते – “दिन भर करती ही क्या हो?” – यह ताना देते देखा है।
समानता का दावा करते इस समाज का दोहरा चेहरा देखा है।
झूठे सम्मान के नाम पर पिता-भाई बिना पछतावे,
बहन-बेटियों के खून से अपने हाथ रंगते देखा है।
समानता का दावा करते इस समाज का दोहरा चेहरा देखा है।
क्या-क्या कहूँ, क्या-क्या देखा है…
सुन, सोच, समझ भी न पाए ऐसी दुनिया देखा है।
समानता का दावा करते इस समाज का दोहरा चेहरा देखा है।

स्मिता, प्रसिद्ध लेखिका, रांची
बेहतरीन
बहुत प्रभावशाली रचना। स्मिता जी हिंदी जगत के उन प्रखर स्वरों में से एक हैं जिन्होंने समकालीन समाज और समाज के प्रति साहित्यकारों की जवाबदेही को सशक्त तरीक़े से उठाया है। इन्हें इस पटल पर पढ़ना अद्भुत है।
बहुत शुक्रिया
आभार
अरब और मध्य ऐशिया के इस्लाम मानने वाले देशों में ऐसी घटनाओं का वर्णन नहीं मिलता क्योंकि औरतों की इज्जत के कुछ मापदण्ड पर वो खरे उतरते देखे जा सकते हैं ।भ्रूण – हत्या की घृणित घटनाओं का ब्यौरा नहीं मिलता ।
मिस्र , सीरिया , यू.ए.ई. , लेबनान , ईरान , ईराक , सेन्ट्रल ऐशिया के देश आदि में भारत से शिक्षा में पिछड़े होने के बावजूद बेटी को गर्भ में मारने के कुकर्म नहीं होते ….उनका वर्तमान सामाजिक इतिहास इसकी गवाही देता है । हम किन संस्कारों पर गर्व करें ?
बहुत शुक्रिया । सहमत हूॅं आपसे।