लकीरों और दायरों के पार

दूर होकर लकीरों, दायरों में तुम बँटने लगी,
सहमी-सहमी, तुम मुझमें ही सिमटने लगी।


ढूँढते-ढूँढते हम पहुँच ही जाएँगे तुम तक,
बीच में थी जो दीवारें, फिर वो हटने लगीं।


सुना था तुम किसी सैलाब की अमानत हो,
लहरों में उठे थे जो उफान, कुछ घटने लगे।


आजकल होंठों को अपनी गठरी में बाँधे,
तुम निगाहों से ही मुझसे बातें करने लगी।

हनीफ सिंधी, प्रसिद्ध लेखक सरखेज रोड, अहमदाबाद

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