लकीरों और दायरों के पार

लकीरों और दायरों ने हमें अलग करने की कोशिश की, पर हर दूरी में तुम और अधिक मेरी ओर सिमट आईं। जिन दीवारों ने हमें रोका था, वे धीरे-धीरे ढहने लगीं। तुम, जो किसी सैलाब की अमानत थीं, अब अपने भीतर की उफान को थामकर शांत बहने लगीं। और जब होंठों ने चुप्पी साध ली, तब निगाहों ने वह सब कह दिया जो शब्दों में बयाँ न हो सका।

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