इंस्टाग्राम पर एक रील कई बार सामने आई एक मां अपने बच्चे को स्कूल छोड़ने आई थी, वहीं दूसरी मां अपनी कार से बच्चे को स्कूल छोड़ने आई. दोनों की नज़रें मिलीं और उन्होंने एक-दूसरे को मुस्कुरा कर देखा.
उस मुस्कान के पीछे, दोनों की आंखों में अनकहे विचार तैर रहे थे.
कार से आई मां, पैदल आई मां को देखकर सोच रही थी कितनी खुशकिस्मत है ये! पूरा दिन अपने बच्चे और परिवार को दे सकती है. बच्चा कितना खुश है, वो इसे कितना वक्त देती होगी. मैं तो दिनभर भागती रहती हूं, ऑफिस-मीटिंग-डेडलाइन, और अब तो घर के लिए भी वक्त नहीं बचता.
उधर, पैदल आई मां सोच रही थी. काश! मैं भी ऐसी होती… ऑफिस जाती, इंडिपेंडेंट होती, बाहर की दुनिया देखती. मेरी ज़िंदगी सिर्फ घर तक सीमित न रहती.
दोनों अपनी-अपनी जगह शायद ठीक थीं, लेकिन संतुष्ट नहीं थीं. यही तो आज की सच्चाई है. जो महिलाएं घर संभालती हैं, उन्हें सिर्फ हाउसवाइ़फ कह कर छोटा समझा जाता है. कभी-कभी खुद उन्हें भी ये बोलते हुए हिचकिचाहट होती है कि मैं जॉब नहीं करती.
लेकिन… क्या वाकई हाउसवाइ़फ होना शर्म की बात है?
हाउसवाइ़फ होना गर्व की बात है.
वह अपने परिवार की नींव होती है, बच्चों का बचपन उसकी गोद में पलता है. पति अपने ऑफिस के काम पर ध्यान दे पाता है क्योंकि उसे पता होता है कि घर पर कोई है जो सबकुछ संभाल रहा है.
अब कृष्णा की कहानी…
कृष्णा सिविल सर्विसेज़ में थी. जब तक शादी नहीं हुई थी, जीवन बहुत आसान था. मां हर चीज़ हाथ में तैयार करके देती थी. लेकिन शादी के बाद जब घर और बाहर की ज़िम्मेदारियाँ आईं, तो चीजें बदलने लगीं.
अमन, उसका पति, सॉफ्टवेयर इंजीनियर था. वह भी थककर लौटता, और किसी तरह की मदद नहीं कर पाता. घर का ज़्यादातर काम नौकरों पर निर्भर हो गया था. कृष्णा की नौकरी और जिम्मेदारियाँ इतनी कठिन थीं कि कभी-कभी सुबह 8 बजे घर से निकलती तो रात 9 बजे तक लौटती. दोनों को सिर्फ रविवार को साथ वक्त मिलता था.
जब कृष्णा मां बनने वाली थी, उसने अमन से बात करके नौकरी छोड़ने का फैसला किया.
घरवालों ने बहुत समझाया इतनी अच्छी नौकरी क्यों छोड़ रही हो?
मां ने भी कहा अरे, नौकरानी रख लो, पैसे से सब हो जाता है.ङ्घङ्घ
कृष्णा ने मुस्कुराकर कहा
मां, आपके समय की परिस्थिति अलग थी. आपको नौकरी करना मजबूरी थी. हम जानते हैं कि आपकी वजह से हम पढ़ सके, आगे बढ़ सके. लेकिन हम आपको कितना मिस करते थे ठंडा खाना, अकेले स्कूल से लौटना, सब खुद से करना यही हमारा बचपन था.
मां, मैं शिकायत नहीं कर रही. लेकिन अब मैं चाहती हूं कि मेरा बेटा जब स्कूल से लौटे, तो मैं उसके लिए वहां मौजूद रहूं. मैं उसका इंतज़ार करूं. मैं चाहती हूं कि जब अमन ऑफिस से लौटे, तो मैं मुस्कुराकर उसका स्वागत करूं. मुझे अब घर संभालना अच्छा लगता है.
मां, पिछला संडे याद है? उसके बाद आज मुझे चैन से बैठकर चाय पीने का वक्त मिला है. वरना ऑफिस की भागदौड़ में सुबह कब निकलती थी, कब चाय पीती थी, कब दिन खत्म होता था, पता ही नहीं चलता था.
अमन की नौकरी बहुत अच्छी है, जिससे हमारा घर अच्छे से चल सकता है. मैं सिर्फ इसलिए जॉब नहीं करना चाहती कि दुनिया को साबित करूं कि मैं भी कुछ हूं. मैं अपने परिवार के लिए हूं यही मेरी पहचान है.
अमन वहां आ गया. उसने मुस्कुरा कर कृष्णा का हाथ पकड़ा और कहा मैं तुम्हारे फैसले में तुम्हारे साथ हूं.
आज कृष्णा अपने बेटे विनायक को स्कूल छोड़ने आई थी. विनायक बोला-मम्मा, जब मैं स्कूल से आऊं तो आप बाहर ही बैठना. मैं ढूंढ़ूंगा तो आप दिखनी चाहिए.
कृष्णा उसकी बात सुनकर मुस्कुरा दी. वो तीन घंटे तक बाहर बैठी रही सिर्फ इसलिए कि उसका बेटा जब लौटे तो उसे वही दिखे, वही महसूस हो जो एक मां के पास होना चाहिए.
जब विनायक लौटा, तो वह उछलता-कूदता आया और अपनी स्कूल की हर बात उसे बताने लगा. कृष्णा उसे सुनती रही जब तक उसकी सारी बातें खत्म नहीं हो गईं.कृष्णा जानती थी उसे यही आज़ादी चाहिए थी.अपने बच्चों के लिए अपने परिवार के लिए
एक हाउसवाइ़फ बनकर वो सबसे आज़ाद और पूर्ण महसूस कर रही थी.
रक्षा उपाध्याय, प्रसिद्ध कहानीकार, इंदौर

रचनाओं की गुणवत्ता बनी रहनी चाहिए। मैं अपनी कहानी लिहाफ़ के बारे में कोई टिप्पणी नहीं दे सकता लेकिन कहानी ‘मैं हाउसवाइफ बनना चाहती हूं’ में लेखिका का कृष्णा के किरदार के साथ न्याय दिखाई देता है।
रक्षा जी, आज के सत्य को अपने, बखूबी शब्दों में पिरोया है। बच्चों का अधिकार है कि जब वह घर लौटें तो,मां दिखाई दे घर में।
वाह दिल की बात.. 👌 लिखिका जी मैं कृष्णा ही hu और आपने मेरे नाम सहित वही लिख दिया जिसे मैंने ही जिया है.. बस मैं teaching job में थी अंतर इतना ही है