गुरु की शरण सौभाग्य का द्वार – पं. राजरक्षितविजयजी

“भाग्य खुलता है तो संपत्ति मिलती है, लेकिन सौभाग्य खुलता है तो सद्गुरु मिलते हैं।” — यही संदेश था पं. राजरक्षितविजयजी महाराज का, जो उन्होंने श्री संभवनाथ जिनालय, गुलटेकड़ी जैन संघ, पुणे में गुरु पूर्णिमा महोत्सव के अवसर पर आयोजित प्रवचन में श्रद्धालुओं को दिया।

सद्गुरु शरणम् मम” विषय पर दिए गए इस विशेष प्रवचन में उन्होंने गुरु की महिमा, शिष्य के कर्तव्य और आध्यात्मिक मार्ग पर सद्गुरु की भूमिका को प्रभावशाली ढंग से समझाया। उन्होंने कहा, “चातुर्मास का प्रारंभ गुरु पूर्णिमा से होता है। यह दिन हमें गुरु की शरण में जाने की प्रेरणा देता है, क्योंकि गुरु ही जीवन की हर बाधा से उबारने वाले मार्गदर्शक होते हैं।”

पं. राजरक्षितविजयजी ने कहा कि वेदों में कहा गया है कि चार मिनट की गुरु सेवा, सोलह वर्षों तक ईश्वर सेवा से भी श्रेष्ठ मानी गई है। उन्होंने गुरु को ‘फैमिली गुरु’ की संज्ञा दी – जो न केवल तन की, बल्कि मन और आत्मा की चिकित्सा भी करते हैं।

उन्होंने उदाहरण देते हुए समझाया कि जैसे सुरक्षित यात्रा के लिए अच्छा ड्राइवर और अच्छे स्वास्थ्य के लिए कुशल डॉक्टर आवश्यक होता है, वैसे ही जीवन के आध्यात्मिक मार्ग को पार करने के लिए एक सच्चे सद्गुरु की आवश्यकता होती है।

इस अवसर पर युवा व्याख्याता पं. नयरक्षितविजयजी ने भाविक ट्यूटोरियल्स के युवाओं को संबोधित करते हुए कहा कि “गुरु ही शिष्य को पूर्णता प्रदान करता है, इसीलिए यह दिन ‘गुरु पूर्णिमा’ कहलाता है।” उन्होंने कहा कि गुरु की कृपा से गूंगा शिष्य बोलने लगता है, लंगड़ा शिष्य दौड़ने लगता है।

उन्होंने गुरु को तीन रूपों में बताया –

  1. साइनबोर्ड गुरु – जो दिशा दिखाते हैं
  2. गाइड गुरु – जो मार्ग पर साथ चलते हैं
  3. हमसफ़र गुरु – जो जीवन यात्रा में साथ निभाते हैं

उन्होंने युवाओं से आह्वान किया कि “अगर आप अपने जीवन को गुणों से भरना चाहते हैं, तो गुरु को हमसफ़र बनाइए। जब गुरु शक्ति का संचार करते हैं, तो शिष्य की मानसिक, शारीरिक और आत्मिक ऊर्जा कई गुना बढ़ जाती है।”

इस भव्य आयोजन में पुणे शहर के अनेक श्रद्धालु गुरुभक्तों ने वंदन-पूजन कर आशीर्वाद प्राप्त किया और गुरु चरणों में अपनी श्रद्धा अर्पित की।

  • सुरेश परिहार, संपादक (लाइव वॉयर न्यूज नेटवर्क)

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