आराधना – जो हर बार टूटी, फिर भी हर बार लौटी

“शराबी आँख जो तेरी देखी…” – ये गाना हर किसी ने कभी न कभी सुना होगा। इसकी धुन कर्णप्रिय है, पर इसके पीछे छिपा दर्द अक्सर अनसुना रह जाता है। शराब सिर्फ नशा नहीं है, ये एक ज़हर है, जो धीरे-धीरे रिश्तों को घुन की तरह खा जाता है। ये चाहे झोपड़ी में रहने वाला हो या हाई सोसायटी का पढ़ा-लिखा इंसान, अगर हद पार हो जाए तो शराब सब कुछ तबाह कर देती है। फिल्मों में हम बार-बार देखते हैं – शराब पीकर पति अपनी पत्नी और बच्चों पर हाथ उठाता है, गालियाँ देता है, और फिर अगली सुबह माफी मांगता है। औरतें हर बार उसे माफ कर देती हैं, उस उम्मीद में कि शायद अगली बार ये नहीं होगा। हाई सोसायटी में तो ये नशा फैशन बन चुका है। शराब हाथ में होना, किसी का स्टेटस सिंबल बन गया है।

ट्रेन में एक 65 साल की महिला बैठी थी – नाम था आराधना। उसके साथ बहू, बेटे, पोते-पोतियाँ – पूरा परिवार था, फिर भी उसकी आंखें खाली थीं। फोन लगातार बज रहा था, वो कभी बेटों से बात कर रही थी, कभी भाई से, पर चेहरा ऐसा था जैसे बहुत कुछ छोड़ आई हो पीछे। शायद घर, शायद खुद को। अचानक उसने फोन बंद किया और उसकी आँखों के सामने उसकी पूरी ज़िंदगी की फिल्म चलने लगी।

वो एक दक्षिण भारतीय ब्राह्मण परिवार से थी। पिता सरकारी अफसर थे, सख्त पर सजग। एक तबादले में परिवार राजनांदगांव आया और वहीं पड़ोस में रहने वाले राजेन्द्र से दिल लग गया। राजेन्द्र एक राजस्थानी ब्राह्मण था। दोनों के धर्म एक थे, लेकिन संस्कृति अलग। माता-पिता ने इस रिश्ते का विरोध किया, लेकिन आराधना की जिद के आगे झुकना पड़ा। शादी हो गई – एक पढ़े-लिखे, अच्छे घर में।

शादी के बाद दोनों तिरुपति गए और आराधना ने अपनी मनौती पूरी करने के लिए वहां सोने की चूड़ियाँ चढ़ाईं। उसकी खुशी का कोई ठिकाना नहीं था। फिर राजेन्द्र की नौकरी दिल्ली में लग गई। नई ज़िंदगी, नए सपने, और हाई सोसायटी में उठना-बैठना शुरू हुआ। क्लब, पार्टी, ड्रिंक – सब कुछ नया और चमकदार था। आराधना को भी ये जीवन अच्छा लगने लगा। धीरे-धीरे राजेन्द्र को शराब की लत लग गई। शुरू में आराधना ने इसे हाई क्लास होने का हिस्सा समझा, थोड़े दिखावे के लिए साथ भी दिया। लेकिन कब ये लत उसकी जिंदगी का अभिशाप बन गई, पता ही नहीं चला। अब राजेन्द्र रोज शराब पीकर आता, आराधना से जबरदस्ती करता, गाली देता, मारता। घर का माहौल जहरीला हो गया।

राजेन्द्र आराधना के मायके वालों को भी अपशब्द कहता। आराधना रोती, सहती, क्योंकि उसके पास कोई और विकल्प नहीं था। मां-बाप के पास लौटने में शर्म आती – क्योंकि माँ पहले ही कह चुकी थी कि ये शादी गलत है। माँ ने कभी उसके शराबी पति को अपने घर आने की इजाजत नहीं दी। समय बीतता गया, बच्चे बड़े हुए – उसी गाली-गलौच और हिंसा के माहौल में। कभी-कभी राजेन्द्र सड़कों पर गिरा मिलता, और बेटे उसे उठाकर लाते। बच्चों में पिता के लिए कोई लगाव नहीं बचा, सिर्फ माँ के लिए सहानुभूति थी। दोनों की शादियाँ हो गईं। बहुएँ घर आईं, पर वो क्यों सास-ससुर के झगड़ों को झेले? उन्होंने दूरी बना ली। बेटों ने भी बहुओं की बातों में आकर अपने माता-पिता से दूरी बना ली। आराधना को अपने बच्चों से उम्मीद थी, लेकिन अब वो भी पराए हो चुके थे।

राजेन्द्र अब 70 साल का था, पर शराब और हिंसा की आदतें नहीं गई थीं। आज भी वो आराधना पर हाथ उठाता था। एक शाम बहुत झगड़ा हुआ। आराधना घर छोड़कर चली गई – छोटे बेटे के पास। पर शांति कब तक रहती? एक महीने बाद फोन आया – राजेन्द्र शराब के नशे में गिर पड़ा था, सिर पर गंभीर चोट लगी थी, डॉक्टर ने तुरंत ऑपरेशन के लिए कहा था। अब वही आराधना, जो अपने पति से जीवनभर ज़ख्म पाती रही, ट्रेन में बैठी थी – आंखें बंद, मन भारी, दिल में एक ही ख्याल – “काश… मर ही गया होता।”

फिर भी जा रही थी… उसी के पास, जिसने उसकी रूह को भी तकलीफ़ दी थी। क्योंकि औरतें सिर्फ माफ नहीं करतीं, वो हर बार टूटकर फिर से जुड़ जाती हैं। क्योंकि उनका प्यार भी गहरा होता है, और सहने की ताक़त भी। आराधना की आंखों में आंसू नहीं थे, शायद क्योंकि सब आंसू तो सालों पहले बह चुके थे। अब बस एक ठंडी सी चुप्पी थी, जो कह रही थी – “एक और पड़ाव, एक और समझौता… शायद आखिरी बार।”

रक्षा उपाध्याय, प्रसिद्ध लेखिका इंदौर

One thought on “आराधना – जो हर बार टूटी, फिर भी हर बार लौटी

  1. सुंदर लेख… प्राय: महिलाओं के साथ यही होता है

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