यदि प्रेम में होते बुद्ध,
तो क्या वृक्ष की जगह,
चुनते,
किसी प्रिय की मुस्कान को,
ध्यानस्थ होने का स्थल?
क्या तब भी मौन होते उनके उत्तर?
या प्रेमिका की आँखों में,
ढूँढते जीवन का अर्थ
जैसे देख रहे हों निर्वाण की झलक,
किसी मानस मन में।
शायद…
वो चुपचाप थामते उसका हाथ,
जैसे थामा था उस कटोरे को
जिसमें रखा था समूचे संसार का दुःख,
बिना किसी अपेक्षा, बिना किसी आहट।
वो प्रेम करते
जैसे लिया था संन्यास।
निःस्वार्थ, निरभिमान,
और पूर्ण।
उनकी आँखों में होता ना कोई मोह,
ना विरक्ति,
केवल सहज स्वीकृति।
जैसे फूल स्वीकारता है वर्षा और धूप
बिना शिकायत।
यदि प्रेम में होते बुद्ध,
तो प्रेम
ना उन्माद होता,
ना त्याग का बोझ।
बल्कि एक धीमी, स्थिर जलधारा,
जो स्वयं को बहा ले जाए
हर “मैं” और “तू” के पार।
क्या तब हम भी समझ पाते,
कि प्रेम भी एक पथ है,
मोक्ष की ही तरह,
जहाँ खोना ही पाना है,
और समर्पण ही सर्वोच्च बोध।
तब शायद,
हम प्रेम में मौन होते,
और मौन में प्रेम।

शारदा कनोरिया ‘शुभा’ प्रसिद्ध कवयित्री, पुणे

अत्यंत ही भावपूर्ण सृजन आदरणीय 👌👌
धन्यवाद आपका 🙏आपकी प्रतिक्रिया अमूल्य है।🌹
आपकी कल्पना और आपकी कविता बेहद खूबसूरत है