उठो, जागो

स्वामी विवेकानंद जयंती पर प्रस्तुत यह कविता युवाओं को निडर बनने, लक्ष्य के प्रति सजग रहने और अपने भीतर ईश्वर को पहचानने का संदेश देती है। सेवा, त्याग और मानवता के माध्यम से सशक्त भारत के निर्माण की प्रेरणा इसमें निहित है।

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शब्दों का आचरण

यह लघुकथा ज्ञान और आचरण के अंतर को उजागर करती है। जो ऋषि संसार को करुणा का उपदेश देता है, वही अपने घर में उसे जी नहीं पाता। अंततः शब्दों की खोखली चमक टूटती है और सच्चे आत्मबोध का जन्म होता है पर एक अपूरणीय क्षति के साथ।

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ज्ञान का कलित वर्णन

यह कविता ज्ञान को रूप, रस, शब्द, अनुभव और विवेक के समग्र स्वरूप में प्रस्तुत करती है। बालक के ‘क, ख, ग’ से लेकर विद्वान की विरासत तक ज्ञान को जीवन, संघर्ष, विनम्रता और सहानुभूति की निरंतर यात्रा के रूप में रेखांकित करती है।

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शरीर नश्वर, आत्मा अमर

यह लेख आत्मा की अमरता, उसके निराकार स्वरूप और परमपिता परमेश्वर से उसके संबंध पर विचार करता है, यह बताते हुए कि शरीर नश्वर है पर आत्मा अजर-अमर है और वही हमारे कर्मों का साक्ष्य रखती है।

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भारतीय ज्ञान परंपरा का वास्तविक चरित्र समावेशी है : अम्बिका दत्त शर्मा

महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, क्षेत्रीय केंद्र कोलकाता और भारतीय दार्शनिक अनुसंधान परिषद (ICPR) नई दिल्ली के संयुक्त तत्वावधान में “भारतीय ज्ञान परंपरा और विज्ञान का दर्शन” विषय पर २८-२९ अगस्त को दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन हुआ।उद्घाटन सत्र में डॉ. अमित राय (संयोजक) ने स्वागत भाषण दिया। विशिष्ट अतिथि बिट्ठलदास मूंधड़ा और मुख्य अतिथि प्रो. नवीन चंद्र लोहानी रहे। प्रो. अम्बिका दत्त शर्मा ने बीज वक्तव्य दिया, जबकि अध्यक्षीय उद्बोधन प्रो. हनुमानप्रसाद शुक्ल ने किया। संचालन डॉ. अमरेन्द्र कुमार शर्मा और धन्यवाद ज्ञापन डॉ. चित्रा माली ने किया।

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यदि प्रेम में होते बुद्ध…

अगर बुद्ध प्रेम में होते, तो शायद वे किसी वृक्ष की छाया के बजाय किसी प्रिय की मुस्कान को ध्यानस्थ होने का स्थान चुनते। उनके उत्तर तब भी मौन होते, लेकिन उस मौन में प्रेम की एक गहरी समझ समाई होती। वे प्रेमिका की आँखों में जीवन का अर्थ खोजते, जैसे निर्वाण की झलक किसी मानस में देख रहे हों। वे प्रेम को उसी तरह थामते जैसे उन्होंने उस कटोरे को थामा था जिसमें संसार का सारा दुःख समाया था—बिना अपेक्षा, बिना आहट। उनका प्रेम निःस्वार्थ और निर्लिप्त होता, जैसे संन्यास लिया हो—पूरी तरह समर्पित, फिर भी पूर्ण स्वतंत्र। न उसमें मोह होता, न विरक्ति—सिर्फ सहज स्वीकृति। प्रेम, उनके लिए, कोई उन्माद नहीं बल्कि एक शांत, स्थिर जलधारा होता, जो “मैं” और “तू” के पार ले जाती। तब शायद हम भी समझ पाते कि प्रेम भी एक मार्ग है—मोक्ष की ओर, जहाँ खोना ही पाना है, और समर्पण ही सबसे बड़ा बोध।

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