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यदि प्रेम में होते बुद्ध…

अगर बुद्ध प्रेम में होते, तो शायद वे किसी वृक्ष की छाया के बजाय किसी प्रिय की मुस्कान को ध्यानस्थ होने का स्थान चुनते। उनके उत्तर तब भी मौन होते, लेकिन उस मौन में प्रेम की एक गहरी समझ समाई होती। वे प्रेमिका की आँखों में जीवन का अर्थ खोजते, जैसे निर्वाण की झलक किसी मानस में देख रहे हों। वे प्रेम को उसी तरह थामते जैसे उन्होंने उस कटोरे को थामा था जिसमें संसार का सारा दुःख समाया था—बिना अपेक्षा, बिना आहट। उनका प्रेम निःस्वार्थ और निर्लिप्त होता, जैसे संन्यास लिया हो—पूरी तरह समर्पित, फिर भी पूर्ण स्वतंत्र। न उसमें मोह होता, न विरक्ति—सिर्फ सहज स्वीकृति। प्रेम, उनके लिए, कोई उन्माद नहीं बल्कि एक शांत, स्थिर जलधारा होता, जो “मैं” और “तू” के पार ले जाती। तब शायद हम भी समझ पाते कि प्रेम भी एक मार्ग है—मोक्ष की ओर, जहाँ खोना ही पाना है, और समर्पण ही सबसे बड़ा बोध।

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