प्रोफेसर अजहर हाशमी नहीं रहे

  • साहित्य जगत ने खोया एक अनमोल रत्न

रतलाम, 11 जून 2025
साहित्य, चिंतन और शब्दों की दुनिया में एक अपूरणीय शून्य छोड़कर प्रसिद्ध साहित्यकार, विचारक और ओजस्वी वक्ता प्रोफेसर अजहर हाशमी का मंगलवार की शाम निधन हो गया. वे पिछले कुछ समय से अस्वस्थ चल रहे थे और रतलाम के एक निजी अस्पताल में उपचाररत थे. मंगलवार को शाम 6:08 बजे उन्होंने अंतिम सांस ली.
उनका अंतिम संस्कार 11 जून की सुबह 10 बजे, उनके जन्मस्थल पिड़ावा, जिला झालावाड़ (राजस्थान) में किया गया. अंतिम दर्शन हेतु उनकी पार्थिव देह रतलाम स्थित उनके निवास इंदिरा नगर में रात 9:30 बजे तक रखी गई, जिसके बाद उसे उनके पैतृक गांव ले जाया गया.
शब्दों के साधक, विचारों के योद्धा
प्रोफेसर हाशमी केवल एक लेखक नहीं थे, वे एक जीवंत साहित्यिक परंपरा के संवाहक थे. उनका जन्म 13 जनवरी 1950 को राजस्थान के झालावाड़ जिले के ग्राम पिड़ावा में एक सामान्य परिवार में हुआ. प्रारंभिक शिक्षा गांव में प्राप्त कर उन्होंने उच्च शिक्षा उज्जैन से पूरी की. इसके पश्चात वे उज्जैन के माधव कॉलेज में प्रोफेसर बने और बाद में रतलाम को अपनी साहित्य और कर्मभूमि बना लिया.
हर विषय पर लेखनी का अधिकार
प्रो. हाशमी की लेखनी इतनी सशक्त थी कि वे हर विषय, हर पर्व और हर शख्सियत पर गहराई से लिख सकते थे. चाहे मदर्स डे, गांधी जयंती, राम नवमी, ईद, क्रिसमस, या फिर महापुरुषों की जयंती, उनके लेख न केवल जानकारियों से भरपूर होते थे, बल्कि उनमें गहरा भावनात्मक और आध्यात्मिक स्पर्श भी होता था.
उनके लेखों में डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम, अटल बिहारी वाजपेयी, इंदिरा गांधी, नेताजी सुभाषचंद्र बोस जैसी विभूतियों की जीवंत छवियां उभरती थीं.
साहित्य के कई रंगों के धनी
प्रो. हाशमी कवि, व्यंग्यकार, गीतकार और प्रवचनकार भी थे. उनकी वाणी में ओज था, विचारों में स्पष्टता और लेखनी में गहराई. उन्होंने देशभर की कई राष्ट्रीय व प्रादेशिक साहित्यिक व्याख्यानमालाओं में भाग लिया और प्रसिद्ध कवियों के साथ मंच साझा किया.
एक युग का अंत
प्रो. हाशमी का जाना केवल रतलाम या पिड़ावा के लिए नहीं, बल्कि पूरे हिंदी साहित्य जगत के लिए एक बड़ी क्षति है. उन्होंने जो ज्ञान, विचार और साहित्य की धरोहर पीछे छोड़ी है, वह आने वाली पीढ़ियों के लिए अमूल्य निधि है.
श्रद्धांजलि
साहित्य के इस विराट साधक को शत-शत नमन.
आपके शब्द हमारे साथ रहेंगे हर किताब में, हर लेख में, हर विचार में.
सबकुछ कहा, सबकुछ लिखा अब मौन ही आपकी आख़िरी कविता है.

सुरेश परिहार , वरिष्ठ पत्रकार, पुणे

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