रात के 1:00 बजे स्टेशन पर बैठे रोहित ने सोचा भी ना था,वो इस तरह आएगी और उसकी ज़िंदगी में सब बदल जाएगा। उसने बहुत कोशिश की,कि वो दोबारा मिल जाए लेकिन जाने कहां खो गई।
रोहित स्टेशन में बैठा सोच रहा था,”पेपर बहुत हार्ड थे मैं नहीं निकाल पाऊंगा,नीट,दुखी मन से वो बैठा,अकेले स्टेशन पर उसके मन में पाप आ रहा था कि,इससे अच्छा है मैं आत्महत्या कर लूं!”
बहुत सारे नकारात्मक विचार उसके मन में कौंध रहे थे।बहुत ही भारी और दुखी मन से उसे लग रहा था,आ रही किसी ट्रेन के सामने आ जाऊँ।
वो सोच ही रहा था,तभी एक अधेड़ उम्र की औरत जो पगली थी,, उसके पास आ कर गौर से देखते हुए बोली,’विकास मेरा बच्चा तू कहां था?कितने दिनों से मैं तुझे तलाश कर रही थी!”
उसके कंधों को पकड़ कर चिल्लाने लगी। तभी कुछ लोग पीछे से दौड़ते हुए उसे पकड़ कर ले जाने लगे।
रोहित ने पूछा,”क्या हुआ?”
तो लोगों ने कहा,”अरे ये पगली है,इसका बेटा था जो शायद तुम्हारी उम्र का ही था,पिछले साल उसने आत्महत्या कर लिया,असफलता की वजह से,तब से ये पागल है और यहीं पर उसके आने का इंतजार करती है।”
रोहित की आंखों से आंसू छल छला गए और उसे लगा कि,”वो कितना गलत सोच रहा था,अगर आज उसने भी यही काम किया होता तो शायद उसकी भी मां और उसके परिवार वाले की क्या दशा होती?”
सर पर हाथ रखकर बैठ गया और ऊपर की ओर देखते हुए ईश्वर से माफी मांगने लगा।तभी रिंग होती है उसके भाई का कॉल रहता है उसने कहा,”कहां हो रोहित?’अभी तक घर क्यों नहीं आए?मां,घर में हम सब परेशान है,माँ भी बहुत परेशान है!”
रोहित ने कहा,”आ रहा हूं भैया,बस ऐसे ही स्टेशन में बैठा हुआ था,कुछ नए सपना बुन रहा था।’
नयी सोच और नए सपने लेकर, आंखों में अपने माता-पिता,भाई बहन का हंसता हुआ चेहरा घूम रहा था,जिससे उसे जीने की शक्ति मिल रही थी।
रोहित यही सोच रहा था कि,”उसने सोचा भी ना था वो इस तरह आएगी और उसकी जिंदगी में सब बदल जाएगा।फिर उसने बहुत कोशिश की कि,वो दोबारा मिल जाए लेकिन जाने कहां खो गई।”
बस उसने सोच लिया था कि,”जीने और सफलता के बहुत रास्ते हैं जिंदगी में,और परिवार से बढ़कर माता-पिता की खुशी से बढ़कर मेरे लिए कुछ नहीं।

अनामिका मिश्रा, प्रसिद्ध लेखिका, जमशेदपुर
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– सुरेश परिहार
सार्थक लेख