बुड्ढा होगा तेरा बाप : महेश शुक्ला

Mahesh Shukla


डॉन का इंतजार तो 11 मुल्कों की पुलिस कर रही है…..


आप मुझे ढूंढ रहे हो और मैं आपका यहां इंतजार कर रहा हूं..ये दोनों डायलॉग अमिताभ बच्चन की फिल्मों में एक में उनका इंतजार हो रहा है दूसरे में वो किसी का इंतजार कर रहे हैं. एकदम कंट्रास्ट. एक दम उलट. वैसे ही हमारे अग्रज, हमारे सहयोगी, हमारे आशीर्वाद दाता महेश शुक्ला भी एकदम कंट्रास्ट है. वे जैसे हैं वैसे दिखते नहीं… जैसे दिखते हैं वैसे हैं नहीं. 60 की उम्र के बाद भी (असली उम्र नहीं बताउंगा) यदि किसी ने उनके प्रति इस बात के लिए सहानुभूति जताई कि वे बुजुर्ग हैं तो भले ही आपको मुंह पर कुछ नहीं कहे लेकिन मन में जरुर कहेंगे बुड्ढा होगा तेरा बाप… क्योंकि इस उम्र में भीशख्सियत हेलमेट लगाकर जब केटीएम जैसी स्पोर्टस बाइक चलाते हैं तो अच्छे-अच्छे युवाओं को पीछे छोड़ देते हैं. इस चक्कर में एक दो बार वे मरते-मरते भी बचे हैं. मैं यहां इस शख्स की बिल्कुल भी तारीफ नहीं करुंगा. आप यही सोच रहे होंगे कि इनके बारे में हमें क्या. हम इन्हें जानते नही.. पहचानते नहीं.. फिर क्यों इनके बारे में पढ़ें. तो मेरा कहना है कि ऐसे लोग हर किसी की जिंदगी में होते हैं. अपने आसपास ही होते हैं, बस उनके पास जाकर उनसे बात करने की आवश्यकता है. बस फिर वे अपने अनुभव का पिटारा आपके सामने खोल देते हैं. महेश शुक्ला मूल रुप से गजलकार और कवि हैं लेकिन कमाल के व्यंगकार है.

उनका बात-बात में कब आपकी चुटकी ले लेंगे. कोई बता नहीं सकता और जब गुस्सा करेंगे तो आप भी सोचेंगे क्या यार बुड्ढा सठिया गया है. इसके अगले सेकंड में आपकी टेबल पर कब मुट्ठी भर चॉकलेट रखकर चले जाएंगे जैसे उनको पता ही नहीं कौन रख गया है. मैं कई बार इनके कोप का भाजन बना हूं. होता यूं था कि मुझे हर महीने घर जाना होता था.. और ऑनलाइन रेल टिकट बुक कराने की सुविधा शुक्लाजी के पास ही थी. इनसे टिकट बुक कराने का हमें ट्रिपल फायदा होता था. एक था ऑफिस में रहते टिकट बुक हो जाती थी, दूसरा पैसों की चिंता नहीं रहती थी.. क्योंकि इनके पास ऑनलाइन पेमेंट करने की सुविधा थी… तीसरा यात्रा पूरी होने के बाद भी टिकट के पैसे लौटाने की चिंता नहीं रहती थी.. वापस लौटकर आने के बाद शुक्लाजी टिकट के पैसे मांगते तो नहीं थे लेकिन दिन जरुर गिनते थे कि एक दिन हुआ… दो दिन हुए.. तीन दिन… इसके बाद इनके सब्र का बांध टूट जाता था.. और एकदम से गुस्से में तुनक कर जबर्दस्त डांट पिलाते थे कि जब तक आपसे पैसे नहीं मांगों आप देते नहीं हो.. और हम सब यही सुनने के लिए इन्हें पैसे लेट देते थे.

जब इनको पैसे मिल जाते थे ये एकदम शांत हो जाते थे. दूसरा हम डिनर हमेशा साथ में करते थे. शुक्लाजी के साथ खाना मुझे इसलिए भी अच्छा लगता था कि इनके यहां खाने में मराठी और उत्तर भारत का गजब फ्यूजन था. इनकी पत्नी उत्तरभारतीय और बहू मराठी.. तो कड़ी और पिटला-भाकरी का अद्भुत शैली थी इनके यहां के खाने में. हम साथ में खाते थे परोसते शुक्लाजी थे. मजाल है कोई सभी चीजें परोसी जाने के पहले खाना शुरु कर दें. मुझे शुक्लाजी के यहां की दाल बहुत पसंद थी. एकदम सादी और हींग-जीरे की झोंक वाली. इनके यहां की दाल खाते वक्त मुझे मेरी मां की दाल याद आती थी
ये बात शुक्लाजी को भी पता होती थी. वे मेरे लिए टिफिन में दाल विशेष रुप से ज्यादा लाते थे. बस ऐसा खट्टा-मीठा प्यार है शुक्लाजी का. आपके आसपास भी ऐसे लोग होंगे. बस उन्हें पहचानने की जरुरत होती है. उनके दिल में आपके प्रति कितना प्यार है.. वे जताते नहीं है लेकिन जरुरत है उन्हें जैसा है वैसा स्वीकार करने की.
कुछ दिनों पहले वे पुणे छोड़कर अकोला चले गए हैं. अभी पिछले दिनों पुणे ऑफिस आए थे. वापस पुणे आने का बोलकर गए थे…. तब से इस डॉन का इंतजार हमारी पूरी मंडली कर रही है लेकिन डॉन है कि हमारा इंतजार वहां कर रहे हैं..

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