
ममतासिंह देवा
हमारे पास जो इतनी रौशनी बिखेरे बैठे हैं,
पता न था वो अंधेरों से भरे बैठे हैं।
जो टपक रही है ज़ुबाँ से उनके इतनी चाशनी,
अपने अंदर बे-शुमार ज़हर समेटे बैठे हैं।
पास जाते वक़्त उनके दीवाने मत हो जाना,
ऊपर से इत्र, अंदर उफ़ूनत से लबरेज़ हुए बैठे हैं।
इरादा ही नहीं है उन्हें कुछ करने का जब,
क्यूँ बेकार का जज़्बा लिए वो बैठे हैं।
राज़ की बात है ये, देखो बहुत बड़ी,
वो झूठी शख़्सियत पर सच का लबादा ओढ़े बैठे हैं।
हयात-ए-जिंदगी में चलना सँभल-सँभल कर,
यहाँ मुख़्तलिफ़ मुख़ालिफ़ घात लगाए बैठे हैं।
अपने अगल-बगल एहतियात बरतना, ज़रा सँभलकर,
चेहरों पर वो अपनाइयत के नक़ाब-दर-नक़ाब लगाए बैठे हैं।
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प्रेम मिलन

आभार सुरेश जी 😊