
गीता मित्तल, मेरठ
अपनी ही आवाज़ गूँजती है कानों में,
कभी जो गुनगुनाया था हृदय से वीराने में।
वो गीत अभी भी साँसों में कहीं बाकी है,
बस फ़र्क इतना है—अब कोई सुनने वाला नहीं।
खिले फूलों की महक फैली होगी हवाओं में,
किसी ने महसूस किया होगा उसे भी कभी,
मैं तो अपनी ही ख़ुशबू तलाशती रही,
बिखरे हुए उन पुराने ख़्वाबों में।
ज़रूरी नहीं कि बारिश ही हुई हो,
हथेलियाँ भीगी होंगी जज़्बातों में,
कुछ आँसू आँखों तक आकर ठहर गए होंगे,
कुछ बह गए होंगे ख़ामोश रातों में।
जो कह न सकी, वो शब्द बनकर लौटते हैं,
जो भूल गई, वो याद बनकर लौटते हैं,
बीता हुआ वक़्त कहाँ सच में बीतता है,
वो तो किसी मोड़ पर फिर सामने आ जाता है।
कभी आईने में चेहरा अपना देखती हूँ,
तो कोई पुराना अक्स नज़र आता है,
जिसे समझा था मैंने पीछे छोड़ दिया,
वही भीतर से आज भी आवाज़ लगाता है।
शायद कुछ रिश्ते मुकम्मल होने के लिए नहीं होते,
बस उम्र भर महसूस होने के लिए होते हैं,
कुछ कहानियाँ किताबों में नहीं मिलतीं,
वे चुपचाप दिल के किसी कोने में जीती हैं।
और फिर किसी ख़ामोश शाम में,
जब दुनिया के सारे शोर थम जाते हैं,
अपनी ही आवाज़ गूँजती है कानों में—
और मैं ख़ुद से ही पूछ बैठती हूँ,
“क्या सचमुच वो सब बीत गया…
या अब भी कहीं बाकी है?”

बहुत सुंदर लिखा 👌
Superb ❤️ di
बेहद शानदार लिखा है दी आपने