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ख़ामोश शाम में पुरानी यादों से घिरी स्त्री और अपनी ही आवाज़ सुनती हुई

अपनी ही आवाज़

कुछ रिश्ते मुकम्मल नहीं होते, फिर भी उम्र भर महसूस होते हैं। ‘अपनी ही आवाज़’ बीती यादों, अधूरे रिश्तों और उस अतीत की कविता है, जो ख़ामोशी में आज भी आवाज़ देता है।

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