अपनी ही आवाज़
कुछ रिश्ते मुकम्मल नहीं होते, फिर भी उम्र भर महसूस होते हैं। ‘अपनी ही आवाज़’ बीती यादों, अधूरे रिश्तों और उस अतीत की कविता है, जो ख़ामोशी में आज भी आवाज़ देता है।

कुछ रिश्ते मुकम्मल नहीं होते, फिर भी उम्र भर महसूस होते हैं। ‘अपनी ही आवाज़’ बीती यादों, अधूरे रिश्तों और उस अतीत की कविता है, जो ख़ामोशी में आज भी आवाज़ देता है।