gulmohar

“मन अमराई महकी रे”

सावन की बारिश में हरे-भरे आम के पेड़ और प्रेम की यादों को दर्शाती हिंदी कविता मन अमराई महकी रे सावन की रिमझिम में जब कोई याद चमकती है, तो मन की अमराई महक उठती है.

ज्योत्सना सक्सेना ‘प्रकाश‘

रिश्तों की भरी जेठ दुपहरी,
छंदित मधुमयी हुई पुरवाई,
सावन की बदली चटकी ऐसी,
छू ली किसने मन अमराई।

मन अमराई महकी रे,
भीगी-भीगी सी पलकों में,
कोई याद चमकी रे…
मन अमराई महकी रे…

तन्हा साँझों की पीर भुलाकर,
गीत सुनाए कोयल काली,
सूने आँगन में रंग उतरे,
बन आई मधुबन की डाली।

मुरझाया मन हुआ गुलमोहर,
सुप्त भावों ने ली अंगड़ाई,
धूप ढली तो चाँद उतर,
रिमझिम रुत ने सुधि दिलवाई।

मन अमराई महकी रे,
साँसों में सावन उतरा,
प्रीत धरा पर बहकी रे…
मन अमराई महकी रे…