
किश्वर अंजुम, भिलाई
सूरज तुलु हुआ और वो नींद से बेदार हुईं, साथ ही घर की ज़रूरतें भी भरपूर अंगड़ाई लेकर जाग गईं। अपनी बिना शक्कर की मज़ेदार चाय का कप लेकर वो आँगन में आ गईं। छोटा-सा सब्ज़ियों का बागीचा किरणों का हाथ पकड़कर खिलखिला रहा था। बहुत ज़्यादा तो नहीं, लेकिन हर रोज़ के काम की पूर्ति के लिए ऑर्गेनिक सब्ज़ियाँ मिल जाती थीं।
“देखूँ, आज कौन-सी फ़सल हमारी थाली की रौनक बढ़ाएगी!” दिल ही दिल में ख़ुद से गुफ़्तगू करते हुए उसने तय किया कि आज भिंडी बनाई जाए। कुल जमा दस-बारह भिंडी के पौधों से लगभग आधा किलो भिंडी निकल गई। क्यारियों की मेड़ पर लगी पालक पर बहार थी। सोचा, पालक-दाल बना लें। उसने पालक भी तोड़ ली।
“गुड मॉर्निंग, भाभी जी!”
बगल के घर की बाउंड्री पार से आवाज़ आई। पड़ोसन मुस्कुराते हुए दीवार से झाँक रही थीं।
“आज कौन-सी सब्ज़ी तोड़ रही हैं?” ललचाई नज़रों से देखते हुए पूछा गया।
पड़ोसन ने बातों की शुरुआत की ही थी कि गली से सब्ज़ी वाला कोचिया पुकार लगाने लगा।
“सब्ज़ी लेकर आती हूँ, भाभी, लेकिन आपकी सब्ज़ियों में जो स्वाद है, वो बाज़ार की सब्ज़ियों में नहीं!”
उसने दिल में सोचा, शुद्ध ऑर्गेनिक फ़सल, जिसका एक-एक पत्ता, एक-एक फल उसकी कड़ी मेहनत और प्यार का नतीजा है, उस जैसा स्वाद उस फ़सल में कहाँ से आएगा, जिसे बाज़ार की मिलावटी मिट्टी और रासायनिक खाद की मदद से मशीनी तरीक़े से उगाया गया है।
थोड़ी मिर्चें और हरा धनिया तोड़कर पड़ोसन की बाउंड्री वॉल पर रखते हुए उसने आवाज़ लगाई, “भाभी, आप धनिया-मिर्चें दीवार पर से ले लेना। मैं अंदर जा रही हूँ!”
उसकी ऐसी ही आदत थी, सबसे प्यार से व्यवहार करने की। नहीं तो इसी पड़ोसन ने कोरोना काल के समय उसके घर की पर्शियन कैट को लेकर कितना ऑब्जेक्शन किया था कि इनकी वजह से कोरोना हो सकता है, इन्हें यहाँ न रखा जाए।
किचन साफ़-सुथरा चमक रहा था। उसने फटाफट नाश्ता बनाया, दोपहर के खाने के लिए सब्ज़ियाँ धोईं और ज़रा फ़रागत पाकर अपना फ़ोन लेकर बैठ गई कि चलो, दस मिनट में सब नाश्ते के लिए पुकार लगाने लगेंगे, तब तक के वक़्त का उपयोग ज़रा अपने शौक़ के लिए कर लें।
स्क्रॉल करते हुए एक पोस्ट पर नज़र पड़ी, जिसमें एक बढ़िया कोटेशन लिखा था।
“वाह!” उसने कहा और लाइक का बटन दबाते हुए आगे बढ़ गई।
सुबह के वक़्त सिर्फ़ दस मिनट भी मिल जाएँ तो बहुत है। पाँच मिनट मोबाइल और पाँच मिनट न्यूज़पेपर को देकर वह फिर गृहस्थी में मशगूल हो गई।
नाश्ता दिया सबको और भिंडी फ्राई, पालक-दाल और रोटियाँ बनाकर सबके टिफ़िन लगाए।
सब अपनी ड्यूटी पर और दोपहर तक सारे काम निपटाने के बाद अब उसे पूरी फ़ुर्सत थी कि एक-डेढ़ घंटा अपने पढ़ने का शौक़ पूरा कर ले।
एक अच्छी-सी कहानी उसकी नज़र से गुज़री। वो पढ़ने लगी तो उसे लगा, ये तो कहीं पढ़ी हुई-सी लग रही है।
एक रोज़ पहले ऑनलाइन पब्लिश हुई कहानी की एक पंचलाइन ही सुबह के कोटेशन में लिखी गई थी।
उफ़! ज़ाहिर था कि कहानी की पंक्ति ज्यों की त्यों उठाकर जिसने कोटेशन डाला था, वो उसका क्रिएशन नहीं था।
ऑर्गेनिक कहानी से ज़्यादा लाइक मिलावटी कोटेशन पर था।
ज़माना मिलावट का ठहरा, लेकिन ऑर्गेनिक तरीक़े से की गई तख़्लीक़ और मिलावट से उगाई गई सब्ज़ियों और रचनाओं का फ़र्क़ ज़ाहिर हो ही जाता है।
उसने मोबाइल रख दिया और अपनी ताज़ा सोच पर एक ऑर्गेनिक कहानी लिखने लगी।
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किश्वर अंजुम जी की ऑर्गेनिक कहानी लेखन का अद्भुत नमूना है। बाद उन्होंने ऑर्गेनिक खेती से शुरू की और किस तरह से आज की इस दुनिया में हर चीज की नकल की जाती है हर चीज में मिलावट की जाती है वहां आकर उन्होंने अपनी लेखनी को विराम दिया जो अपने आप में उम्दा लेखन का नायाब नमूना है।
बहुत शुक्रिया 🌹 प्रिय रत्ना
किश्वर अंजुम जी की ऑर्गेनिक कहानी लेखन का अद्भुत नमूना है। बात उन्होंने ऑर्गेनिक खेती से शुरू की और किस तरह से आज की इस दुनिया में हर चीज की नकल की जाती है हर चीज में मिलावट की जाती है वहां आकर उन्होंने अपनी लेखनी को विराम दिया जो अपने आप में उम्दा लेखन का नायाब नमूना है।