
मौसमी चंद्रा, पटना
मेरे मरद ने छोड़ दिया है दारू! महीना भर होने को आया, हाथ भी नहीं लगाया उसने दारू को! आजकल मदद भी करता है मेरी खूब। कल मालकिन के घर मेहमान आए रहे, दिनभर मेरा पैरैया हो गया। रात में कमर में जो टीस उठनी शुरू हुई कि पूछो ही मत! फिर मेरे मरद ने तेल गरम किया और जो मालिश की… पूरा शरीर हल्का! सच कहें तो गुंजा दीदी! ई रुपिया-पइसा सब मैल है। असल में सुख वहीं, जहाँ मरद का साथ मिले! चलिए… अब जा रहे काम पर। आज पगार का दिन है। देर करेंगे, त कहीं तुनककर मालकिनी देबो न करे। बड़ी तुनकाही है… हि हि…”
कहकर रानी आँचल का कोना मुँह में दबाकर हँसने लगी।
“हम्म! जाओ, जल्दी फिर!”
गुंजा ने कहा।
रानी की बातें उसे उदास कर गईं।
सोचने लगी—
“कहीं मैंने अपने पति को छोड़कर गलती तो नहीं कर दी? क्या पता, वो भी शराब पीना बंद कर देता!”
सोचते ही होंठों से सिसकारी-सी उठी।
उसके हाथ कान के पीछे सहलाने लगे, जहाँ छूने पर अब भी झनझनाहट होती है।
“न! वो शराब छोड़े, इसके इंतज़ार में और कितने थप्पड़ खाती? सबकी किस्मत रानी जैसी नहीं होती। मेरी किस्मत में अकेले ही रहना लिखा था। कमाओ भी अकेले और खाओ भी अकेले! बस रात में खाली अँधेरी कोठरी सायँ-सायँ करती है, तब लहर उठती है सीने में! मेरे साथ ऐसा क्यों किए भगवान!”
हफ्ते भर बाद एक शाम रानी दिखी। चेहरा मलिन, तुड़ी-मुड़ी-सी सूती साड़ी और एक हाथ गमछे से कसकर बँधा हुआ!
“अरे रानी, कितने दिन बाद दिखी। किधर थी? और… तबीयत खराब है क्या तेरी! हाथ को क्या हुआ?”
गुंजा के पूछते ही रानी ने सिर झुकाकर जवाब दिया—
“दो महीने से मेरे मरद की नौकरी छूटी थी, दीदी। इधर ईंट-भट्ठे पर नया काम मिला है। अब फिर से रोज रात पीकर आना शुरू… हमने मना किया तो दीवार पर मेरा हाथ दे मारा… दीदी, ई दारूबाज सब कभी नहीं सुधरते! इनका दारू पीना… छोड़ना… फिर पीना… चलता रहता है। पियक्कड़ों का कोई ईमान-धरम नहीं होता, दीदी।”
वो चली गई।
मेरा हाथ अपनी कान के पीछे चला गया।
आज झनझनाहट नहीं हुई।
अँधेरी कोठरी में शांति भी थी और… सुकून भी!
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अच्छी कहानी 👌