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कान्हा तेरी पगड़ी की मोर पांखड़ी बन जाऊँ

मोरपंख मुकुट धारण किए बाँसुरी बजाते श्रीकृष्ण का भक्ति भाव से भरा दृश्य

मेघा अग्रवाल, नागपुर (महाराष्ट्र)

कान्हा, तेरी पगड़ी की मोर पांखड़ी बन जाऊँ,
मोड़ झड़ी बनकर मैं सारे बृज पर लहराऊँ।

कान्हा, तेरी अखियाँ की मैं काजल बन जाऊँ,
खुशियों के आँसू बन आँखों से झर-झर जाऊँ।

कान्हा, मैं हाथन की बाँसुरी बन जाऊँ,
तेरे अधरों से लग करके मैं तो सँवर जाऊँ।

कान्हा, मैं तेरे कानों का कुंडल बन जाऊँ,
कुंडल बनकर कर घूम-घूम लहराए।

कान्हा, मैं तेरे हाथों का कड़ा बन जाऊँ,
सारी पृथ्वी को गोल-गोल उँगली पर नचाऊँ।

कान्हा, मैं तेरे पैरों की पायल बन जाऊँ,
छम-छम कर गोकुल में धूम मचाऊँ।

कान्हा, मैं तेरे चरणों की धूल बन जाऊँ,
माटी में मिलकर मैं जीवन से तर जाऊँ।

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