
डॉ. शशिकला पटेल, मुंबई
जब कोई भी इंसान कुछ कर गुजरने की ज़िद ठान ले, तब उसके उठते पाँवों को तूफ़ान भी नहीं रोक सकते. चाहत चेतना का अलाव बनकर जल उठती है और ज़िद उठते पाँवों को रफ़्तार देती है. ऐसी रफ़्तार, जिसे मौजों की रवानी रोकती नहीं, बल्कि आगे बढ़ने का रास्ता आग़ाज़ कर देती है.
श्रावण के महीने में प्रयाग की पावन धरती पर बसे एक छोटे-से गाँव में जब वर्षा अपने शीतल जल से धरती की प्यास बुझाने आई, चारों ओर ठंडी हवाएँ बहने लगीं. ठंडी बयार के साथ हर दिल में उमंगें जगी थीं. उसी दिन किसान हरिनारायण के घर एक कन्या ने जन्म लिया. मिट्टी की सोंधी खुशबू, खेतों में लहलहाती फसलें और माँ की ममता के बीच वह बच्ची मानो घर में उजाला बनकर आई थी. उसका नाम भी रखा गया—उजाला.
हरिनारायण साधारण किसान थे, पर विचारों से बहुत समृद्ध थे. उनकी पत्नी कमला पढ़ी-लिखी नहीं थीं, लेकिन बच्चों को शिक्षित करने का सपना उनकी आँखों में हर समय चमकता रहता. हरिनारायण रात को लालटेन की रोशनी में बच्चों को पास बैठाकर ज्ञानवर्धक कहानियाँ सुनाते. छोटी-सी उजाला उन्हीं शब्दों की दुनिया में खो जाती.
अपने आप में खो जाना बालमन की विचारशून्यता नहीं, बल्कि नई सुबह की रवि-रश्मि में अपनी लालसा को सजाने का सरल-सहज और अबाधित प्रवाह रहा. विचारमग्नता में अपने भविष्य को नई आकृति में सजाने की उत्सुकता थी.
एक बार पास बैठे बच्चों को पढ़ाते समय हरिनारायण की नज़रें अपनी उस मासूम पुत्री उजाला पर टिक गईं, जिसकी पलकें बंद थीं और वह विचारमग्न थी. उन्होंने आवाज़ दी—
“उजाला.”
उजाला की पलकें खुलीं. वह अपने पिता की ओर देख रही थी. खामोश उजाला को देख हरिनारायण ने पूछा—
“नींद आ रही है?”
“नहीं,” उजाला ने सिर हिलाते हुए उत्तर दिया.
सशंकित होकर हरिनारायण ने पूछा—
“तो फिर क्या सोच रही थी तुम?”
उजाला बोली नहीं, बल्कि वह मुस्कराती रही.
उत्सुकतावश हरिनारायण ने पुत्री से पूछा—
“क्या तुम अपने बारे में सोच रही थी?”
“हाँ, पापा.”
“अपने बारे में, मगर क्या?” हरिनारायण ने पूछा.
उजाला उठ खड़ी हुई. उसने सिर उठाकर चाँद की ओर इशारा करते हुए हरिनारायण से कहा—
“वो देखो, पापा!”
चाँद को देखकर हरिनारायण ने पूछा—
“वो चाँद?”
“हाँ, पापा. मैं चाँद की तरह मुस्कराना चाहती हूँ.”
सुनकर पुत्री की निश्चल कामना में हरिनारायण खो गए.
समय बदला. खेती से घर चलाना कठिन होने लगा. रोज़गार की तलाश में हरिनारायण परिवार सहित मध्य प्रदेश के एक छोटे नगर सिवनी आ बसे. नया शहर, नए लोग, नई भाषा… पर उजाला की आँखों में वही पुराने सपने थे. सरकारी स्कूल की नीली यूनिफॉर्म पहनकर जब वह पहली बार स्कूल गई, तो उसकी चाल में झिझक कम और जिज्ञासा अधिक थी.
वह पढ़ाई में इतनी तेज़ थी कि शिक्षक भी उसकी प्रशंसा करते नहीं थकते. किताबें उसके लिए केवल परीक्षा पास करने का माध्यम नहीं थीं, बल्कि जीवन को समझने का रास्ता भी थीं. घर में जब बाकी बच्चे खेलते, तब उजाला किसी कोने में बैठकर पुस्तक पढ़ती मिलती. माँ अक्सर मुस्कराकर कहतीं—
“यह लड़की तो किताबों में ही अपना संसार ढूँढ़ लेती है.”
धीरे-धीरे वह स्कूल से कॉलेज पहुँच गई. परिवार की बड़ी बेटी होने के कारण कुछ ज़िम्मेदारियाँ भी उसी के कंधों पर थीं. पिता चाहते थे कि बेटी खूब पढ़े, पर समाज की परंपराएँ उन्हें बार-बार रोकतीं. रिश्तेदार कहते—
“लड़की ज़्यादा पढ़ जाए तो शादी में दिक्कत होती है.”
और आखिर वही हुआ, जिसका डर उजाला के मन में कहीं छिपा बैठा था. स्नातक करते हुए ही उसका विवाह मुंबई के रहने वाले विनय से तय कर दिया गया.
मुंबई… रंगीन सपनों का शहर, पर उजाला के लिए वह शुरुआत में सपनों से अधिक संघर्षों का शहर साबित हुआ. मालाड की एक पुरानी चॉल में उसका घर. सुबह होते ही पानी भरना, खाना बनाना, परिवार की देखभाल और दिनभर घर के काम. दोपहर को चॉल की औरतें गली में बैठकर बातें करतीं, सिलाई-बुनाई करतीं और हँसती-बतियातीं. वे उजाला को भी बुलातीं, पर वह वहाँ खुद को कभी सहज महसूस नहीं कर पाती.
उसका मन अब भी किताबों के पन्नों में भटकता था.
रात को जब सब सो जाते, तब उजाला चुपचाप अलमारी से कोई किताब निकालती और खिड़की के पास बैठकर पढ़ने लगती. उसे लगता, जैसे शब्द ही उसके सच्चे साथी हैं.
सौभाग्य से उसके पति विनय पढ़े-लिखे और समझदार व्यक्ति थे. सरकारी नौकरी करते थे और साहित्य में गहरी रुचि रखते थे. घर में वे अक्सर नई-नई पुस्तकें लाते. एक दिन उन्होंने देखा कि उजाला देर रात तक कोई किताब पढ़ रही है.
“तुम्हें पढ़ना इतना अच्छा लगता है?” विनय ने पूछा.
उजाला ने धीमे स्वर में कहा—
“पढ़ना ही नहीं… मैं आगे पढ़ना भी चाहती हूँ.”
उस रात पहली बार उसने अपने मन की जिज्ञासा किसी के सामने रखी थी.
विनय मुस्कराने लगे. उनकी मुस्कराहट में उजाला के प्रति स्वीकृति थी.
“तो फिर रुको मत. सपनों को बंद अलमारी में नहीं रखना चाहिए.”
पति के उन शब्दों ने जैसे उजाला के भीतर बुझती लौ को फिर से जला दिया.
लेकिन राह आसान नहीं थी. घर, बच्चे, ज़िम्मेदारियाँ, सब साथ-साथ थे. उसने कुछ समय तक सिलाई का काम किया. बाद में घर पर टाइपिंग का काम भी शुरू कर दिया. धीरे-धीरे उसकी मेहनत और लगन देखकर आसपास के लोग प्रभावित होने लगे.
कभी-कभी विनय के मित्र घर आते. वे देखते कि एक महिला घर के सारे काम सँभालने के बाद टाइपिंग कर रही है, किताबें पढ़ रही है. एक प्रोफेसर ने उससे कहा—
“तुम्हारे भीतर बहुत क्षमता है. तुम्हें शिक्षण के क्षेत्र में आना चाहिए.”
यह वाक्य उसके मन में लंबे समय तक गूँजता रहा.
एक दिन उसने निर्णय ले लिया.
अब उसने बच्चों के साथ खुद भी पढ़ने का निर्णय लिया.
घर-परिवार, बच्चे और कई न खत्म होने वाले काम. कई बार थकान इतनी होती कि आँखें खुद-ब-खुद बंद होने लगतीं, लेकिन वह आँखें खोलकर फिर किताब खोल लेती. उसे लगता था कि यदि अभी हार गई, तो जीवन भर पछतावा रहेगा.
धीरे-धीरे उसने उच्च स्तर की डिग्रियाँ हासिल कर लीं. तब पूरा परिवार गर्व से भर उठा. कभी चॉल की छोटी-सी खिड़की के पास बैठकर पढ़ने वाली वह स्त्री अब कॉलेज में विद्यार्थियों को पढ़ा रही थी.
उजाला केवल अध्यापिका नहीं बनी, बल्कि वह विद्यार्थियों के लिए प्रेरणा बन गई. उसके शब्दों में अनुभव था, संघर्ष से गुजरने का संकल्प था और जीवन की सच्चाई को स्वीकृति प्रदान करने की हिम्मत थी. वह अक्सर अपने विद्यार्थियों से कहती—
“मुश्किलें रास्ता रोकने नहीं आतीं, बल्कि हमें मजबूत बनाने आती हैं.”
चट्टानों की टकराहट जोश-ओ-जज़्बे को ऐसी ताकत प्रदान करती है, जो अपराजित है, अजेय है, अबाधित है.
उसकी कक्षाओं में केवल पाठ्यक्रम नहीं पढ़ाया जाता था, बल्कि वहाँ जीवन जीने की कला भी सिखाई जाती थी.
समय के साथ उसकी पहचान एक संवेदनशील कवयित्री और लेखिका के रूप में भी बनने लगी. उसकी कविताओं में संघर्ष की तपिश भी थी और उम्मीद की रोशनी भी थी. सामाजिक कार्यक्रमों में उसे आमंत्रित किया जाने लगा. लोग कहते—
“उजाला जी की बात सीधे दिल में उतर जाती है.”
उनकी रचनाएँ सिर्फ शब्दजाल नहीं, बल्कि सकारात्मक परिवर्तन का शंखनाद थीं. संघर्ष से गुजरने की प्रेरणा थीं.
उधर उसके बच्चे भी बड़े हो रहे थे. बड़ी बेटी आर्या ने इंजीनियरिंग की पढ़ाई की और एक प्रतिष्ठित कंपनी में नौकरी प्राप्त की. छोटी बेटी निष्ठा ने चिकित्सा के क्षेत्र को चुना. जब लोग उजाला से उसकी सफलता का रहस्य पूछते, तब वह मुस्कराकर कहती—
“मैंने बस कभी सीखना बंद नहीं किया.”
उस संघर्ष-पथ पर चलते-चलते रुकना नहीं सीखा, जिस पर काँटे और नुकीले पत्थर बिछे हैं.
एक साहित्यिक संस्था ने उन्हें “साहित्य गौरव सम्मान” से सम्मानित किया. तब उनकी आँखें भर आईं. तालियों की गड़गड़ाहट के बीच उन्हें अपने संघर्षों के वे सारे दिन याद आ रहे थे—चॉल का छोटा कमरा, देर रात तक जलता बल्ब, बच्चों के सो जाने के बाद की पढ़ाई और अनगिनत थकान भरी रातें.
कार्यक्रम समाप्त होने के बाद एक छात्रा उनके पास आई और बोली—
“मैडम, आपकी कहानी सुनकर लगता है कि अब मैं भी अपने सपने पूरे कर सकती हूँ.”
उजाला ने उसके सिर पर हाथ रखा और कहा—
“सपनों की सबसे बड़ी ताकत यही होती है कि वे हमें गिरकर भी फिर उठना सिखाते हैं.”
उस रात घर लौटते समय आसमान में पूरा चाँद चमक रहा था. उजाला बालकनी में खड़ी उसे देखती रही. उसे लगा, जीवन ने भले ही रास्ते कठिन दिए, पर हर कठिन मोड़ पर उसने उसे नया साहस भी दिया.
और शायद यही जीवन का सबसे बड़ा सत्य है—
साधारण परिस्थितियों में जन्म लेने वाले लोग भी अपने साहस, शिक्षा और संकल्प से असाधारण कहानी लिख सकते हैं.
जब कभी वह सुहानी रात में आसमान की तरफ देखती थी, तब उसके लरज़ते होंठों की मुस्कराहट चाँद की मुस्कराहट पर अपनी अहमियत दर्ज़ कर देती थी.
चाँद की अजीब-सी मुस्कराहट को चूमती उजाला की मुस्कराहट.
