सिद्धि तप केवल उपवास नहीं, आत्मसंयम और आत्मशुद्धि की कठिन साधना

सुरेश परिहार, संपादक, लाइव वायर न्यूज़, पुणे
महिदपुर रोड।
श्री राजेंद्र सूरी ज्ञान मंदिर में चातुर्मास के लिए विराजित परमपूज्य साध्वी डॉ. अमृतरसाजी मसा के सानिध्य में इन दिनों तप-तपस्याओं का दौर पूरे उत्साह और श्रद्धा के साथ चल रहा है। महिदपुर रोड श्रीसंघ के अध्यक्ष अजयजी चोरड़िया ने बताया कि इस बार 52 तपस्वियों द्वारा सिद्धि तप की आराधना की जा रही है, जो महिदपुर रोड के लिए एक ऐतिहासिक और उल्लेखनीय अवसर है। तपस्वियों की साधना के साथ पूरा श्रीसंघ धार्मिक वातावरण में डूबा हुआ है। सिद्धि तप जैन धर्म की कठिन और क्रमिक तप साधनाओं में से एक है। लेकिन इसका अर्थ केवल कई दिनों तक अन्न का त्याग करना नहीं है। इसके पीछे आत्मसंयम, इंद्रिय निग्रह, कषायों पर नियंत्रण, आत्मचिंतन और कर्मों की निर्जरा जैसी गहरी आध्यात्मिक भावनाएं जुड़ी हुई हैं।
क्या है सिद्धि तप?
जैन परंपरा में तप को आत्मशुद्धि और कर्म निर्जरा का महत्वपूर्ण साधन माना गया है। सिद्धि तप में उपवास की अवधि क्रमशः बढ़ाई जाती है। प्रचलित विधि के अनुसार साधक एक दिन उपवास के बाद पारणा करता है, फिर दो दिन उपवास, उसके बाद पारणा और इसी क्रम से तीन, चार, पांच, छह, सात और आठ दिनों तक उपवास की साधना की जाती है।इस क्रम को सामान्यतः 44 दिनों में पूरा किया जाता है, जिसमें 36 दिन उपवास और 8 दिन पारणा के बताए जाते हैं। हालांकि इसकी विधि संबंधित जैन परंपरा, गुरु के निर्देश और साधक की क्षमता के अनुसार अलग हो सकती है।यहां ‘पारणा’ का अर्थ उपवास खोलना है। पारणा भी साधना का ही हिस्सा माना जाता है और इसे धार्मिक मर्यादा एवं गुरु के मार्गदर्शन के अनुसार संयमपूर्वक किया जाता है।
भूख पर नियंत्रण से आगे मन पर विजय की साधना
सिद्धि तप की वास्तविक कसौटी केवल यह नहीं है कि साधक ने कितने दिन भोजन नहीं किया। तप का गहरा उद्देश्य मन और इंद्रियों पर नियंत्रण स्थापित करना है।जैन दर्शन में क्रोध, मान, माया और लोभ को प्रमुख कषाय माना गया है। तप के माध्यम से साधक इन आंतरिक विकारों को पहचानने और उन पर नियंत्रण का अभ्यास करता है। इसीलिए तप को शरीर की परीक्षा के साथ-साथ मन की साधना भी कहा जा सकता है।जब व्यक्ति अपनी स्वाद और भोजन संबंधी इच्छाओं पर संयम करता है, तब उसके भीतर अनुशासन और आत्मनियंत्रण की भावना मजबूत होती है। धीरे-धीरे यही साधना उसे सांसारिक आसक्ति से दूर कर आत्मचिंतन और वैराग्य की ओर ले जाने का माध्यम बनती है।
तप के साथ स्वाध्याय और आत्मचिंतन
सिद्धि तप के दौरान साधक के लिए केवल आहार संयम ही महत्वपूर्ण नहीं होता। नवकार मंत्र, सामायिक, प्रतिक्रमण, स्वाध्याय और ध्यान जैसी धार्मिक साधनाओं के माध्यम से मन को एकाग्र करने और आत्मनिरीक्षण का प्रयास किया जाता है।जैन दर्शन की दृष्टि से बाहरी तप तभी सार्थक है, जब उसके साथ भीतर भी परिवर्तन आए। यदि व्यक्ति उपवास करता रहे, लेकिन उसके मन में क्रोध, अहंकार, द्वेष या लोभ बना रहे, तो तप का वास्तविक उद्देश्य अधूरा रह जाता है।इसलिए तप का अंतिम लक्ष्य शरीर को कष्ट देना नहीं, बल्कि मन, वचन और आचरण को अधिक संयमित एवं निर्मल बनाना है।
कर्म निर्जरा की ओर बढ़ने का माध्यम
जैन दर्शन में कर्मों की निर्जरा को आध्यात्मिक साधना का महत्वपूर्ण पक्ष माना गया है। तप, संयम और आत्मचिंतन के माध्यम से साधक कर्मों के क्षय की दिशा में आगे बढ़ने का प्रयास करता है।सिद्धि तप इसी भावना को व्यवहार में उतारने वाली कठिन साधना है। लंबे समय तक चलने वाली यह तपस्या साधक को अपनी इच्छाओं, आदतों और मानसिक प्रवृत्तियों को देखने का अवसर देती है।इस अर्थ में सिद्धि तप ‘मैं क्या चाहता हूं’ से ‘मेरे भीतर वास्तव में क्या है’ की यात्रा भी बन जाता है।
समता और क्षमा भी तप का हिस्सा
जैन धर्म की साधना में तप के साथ अहिंसा, क्षमा, विनम्रता, सेवा, स्वाध्याय और समता को विशेष महत्व दिया जाता है। तपस्वी के लिए यह आवश्यक माना जाता है कि साधना उसके व्यवहार में भी दिखाई दे।सच्चे तप का प्रभाव तब दिखाई देता है, जब व्यक्ति अधिक शांत, विनम्र, सहनशील और आत्मचिंतनशील बनता है। इसीलिए सिद्धि तप को केवल उपवास की संख्या से मापना इसके आध्यात्मिक अर्थ को सीमित करना होगा।तप की सफलता शरीर की सहनशक्ति से अधिक मन की शुद्धता में है।
52 तपस्वियों की साधना बना आकर्षण का केंद्र
महिदपुर रोड में इस बार 52 तपस्वियों द्वारा सिद्धि तप किया जाना श्रीसंघ के लिए विशेष धार्मिक अवसर है। साध्वी डॉ. अमृतरसाजी मसा के सानिध्य में चल रही तप आराधना से समाज में उत्साह का वातावरण है। तपस्वियों के प्रति श्रद्धालुओं द्वारा प्रभावना एवं अनुमोदना की जा रही है।चातुर्मास के दौरान होने वाली ऐसी सामूहिक धार्मिक साधनाएं केवल तपस्वियों के लिए ही नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए आत्मचिंतन और धर्म के प्रति जुड़ाव का अवसर बनती हैं।लंबे समय तक चलने वाला उपवास कठिन साधना है। इसलिए इसे धार्मिक परंपरा और गुरु के मार्गदर्शन के अनुसार ही किया जाना चाहिए। साधक की शारीरिक क्षमता और स्वास्थ्य की स्थिति को ध्यान में रखना भी आवश्यक है।तप का उद्देश्य आत्मसंयम और आध्यात्मिक उन्नति है। इसलिए साधना में श्रद्धा के साथ विवेक और उचित मार्गदर्शन का होना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
तप का सार क्या है?
सिद्धि तप का सार केवल भोजन का त्याग नहीं, बल्कि इच्छाओं पर संयम, कषायों पर नियंत्रण, आत्मचिंतन और जीवन में समता का विकास है। यह साधना व्यक्ति को बाहर की दुनिया से हटाकर कुछ समय के लिए अपने भीतर झांकने का अवसर देती है।महिदपुर रोड में 52 तपस्वियों की यह सामूहिक साधना इसी आध्यात्मिक भावना को सामने ला रही है कि तप शरीर की कठिन परीक्षा से आगे बढ़कर आत्मा को समझने और स्वयं को भीतर से बदलने की साधना है।संदेश यही है. उपवास शरीर को रोकता है, लेकिन सच्चा तप मन को जीतने की राह दिखाता है।
