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…गर तुम साथ हो

पत्नी की याद में अकेला बैठा व्यक्ति और उसके सामने रखी कुर्सी, भावुक प्रेम कहानी

रुचि अग्रवाल, सिलीगुड़ी (पश्चिम बंगाल)

सारंग को नींद नहीं आ रही थी…..रात के ढाई बज चुके थे। पूरे घर में सन्नाटा था, लेकिन उसकी आंखें छत पर टिकी हुई थीं। कमरे की दूसरी तरफ रखी कुर्सी खाली थी।

वही कुर्सी जिस पर बैठकर वाणी रात को उससे बातें किया करती थी।

वाणी इस दुनिया में नहीं थी।

उसे गए दो साल हो चुके थे।

लेकिन कुछ प्रेम कहानियां मृत्यु से खत्म नहीं होतीं, वे यादों में एक दूसरा जीवन जीने लगती हैं।

सारंग और वाणी की शादी को केवल पांच साल हुए थे, लेकिन उन पांच वर्षों में उन्होंने एक पूरी जिंदगी जी ली थी। दोनों के पास बहुत पैसा नहीं था। बड़ा घर नहीं था। विदेश यात्राएं नहीं थीं। लेकिन उनके पास एक-दूसरे का साथ था।

और शायद प्रेम के लिए वही काफी था।

वाणी को छोटी-छोटी चीजों में खुशी ढूंढने की आदत थी।

बरसात की पहली बूंद गिरते ही वह छत पर पहुंच जाती।

सड़क किनारे मिलने वाली कुल्हड़ वाली चाय उसके लिए किसी पांच सितारा होटल की कॉफी से ज्यादा कीमती थी।

और जब भी सारंग परेशान होता, वह उसका चेहरा दोनों हथेलियों में लेकर कहती—

“इतना क्यों सोचते हो? गर मैं साथ हूं तो डर किस बात का?”

सारंग हंस देता।

उसे तब नहीं पता था कि एक दिन वही शब्द उसकी जिंदगी का सहारा बन जाएंगे।

एक सड़क दुर्घटना ने सब कुछ बदल दिया।

वाणी चली गई।

सिर्फ एक पल में।

और सारंग की दुनिया सूनी हो गई।

शुरुआत के महीनों में उसने खुद को कमरे में बंद कर लिया। किसी से बात नहीं करता। किसी से मिलता नहीं।

उसे लगता था कि उसके जीने की वजह खत्म हो चुकी है।

फिर एक दिन अलमारी साफ करते समय उसे एक लकड़ी का डिब्बा मिला।

डिब्बे पर लिखा था-

“जब मैं तुम्हारे पास न रहूं, तब खोलना।”

उसके हाथ कांप गए।

डिब्बा खोला।

अंदर 52 लिफाफे थे।

हर लिफाफे पर एक संख्या लिखी थी।

1, 2, 3, 4…

52 तक।

पहले लिफाफे में एक चिट्ठी थी।

“अगर तुम ये पढ़ रहे हो तो इसका मतलब मैं तुम्हारे पास नहीं हूं। लेकिन उदास मत होना। मैंने तुम्हारे लिए पूरे एक साल का साथ छोड़कर रखा है। हर रविवार एक लिफाफा खोलना।”

सारंग की आंखें भर आईं।

अगले रविवार उसने दूसरा लिफाफा खोला।

उसमें लिखा था-

“आज बाहर जाकर अपनी पसंद की चाय पीना। और हां, बिल देते समय मुस्कुराना मत भूलना।”

तीसरे लिफाफे में लिखा था-

“आज किसी अनजान इंसान की मदद करना। मुझे अच्छा लगेगा।”

किसी में उनकी पुरानी तस्वीर थी।

किसी में एक अधूरा किस्सा।

किसी में एक शरारत।

किसी में प्रेम।

और किसी में डांट।

धीरे-धीरे सारंग फिर से जीना सीखने लगा।

हर रविवार उसे लगता कि वाणी उसके पास बैठी है।

उसी कुर्सी पर।

उसी मुस्कान के साथ।

एक साल बाद आखिरी लिफाफा बचा।

सारंग ने कांपते हाथों से उसे खोला।

अंदर सिर्फ एक पंक्ति लिखी थी-

“अगर यहां तक पहुंच गए हो, तो इसका मतलब तुम फिर से जीना सीख गए हो। अब मुझे ढूंढना बंद करो। मैं तुम्हारे हर अच्छे काम में हूं, हर मुस्कान में हूं, हर उस पल में हूं जब तुम किसी और को खुश करते हो।”

नीचे एक आखिरी वाक्य लिखा था—

“तुम हमेशा पूछते थे कि अगर तुम साथ न हुई तो मैं क्या करूंगा? जवाब यही है… मैं फिर भी तुम्हारे साथ रहूंगी, बस दिखाई नहीं दूंगी।”

सारंग की आंखों से आंसू बह निकले।

उसने पहली बार आसमान की तरफ देखकर मुस्कुराया।

उस दिन उसे समझ आया कि प्रेम केवल साथ रहने का नाम नहीं है।

कभी-कभी प्रेम किसी के जाने के बाद भी आपके भीतर जिंदा रहता है।

आपको संभालता है।

आपको आगे बढ़ाता है।

और हर कठिन मोड़ पर कानों में फुसफुसाता है—

“डरो मत… गर तुम साथ हो, तो मैं भी कहीं न कहीं साथ हूं।”

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