
प्रीति अरोरा, बदायूं (उत्तर प्रदेश)
ए सावन, ज़रा थम-थम कर बरस,
पिछले सावन की याद अब भी है नम।
उनकी मौजूदगी और तेरा बरसना,
मन हारिल पंछी हो जाता था,
तेरी पहली बूँद की छुअन……..
जैसे प्रेम-समर्पण चरम हो जाता था।
अब ना सावन की रिमझिम
मेरे मन को भाती है……
यादों का घट अभी छलक रहा है,
सावन, तेरी अश्रु-सी बरसातों में
मेरी रात कहर हो जाती है।
तेरी गरज-गरज कर वृष्टि
नहीं तात्पर्य मुझे यह सृष्टि……
तेरा तूफानों संग गठबंधन,
पर मैंने तोड़ दिए सारे बंधन।
तेरा टूट-टूट कर झर-झर झरना
और नदियों-तालाबों से मिलना,
मेरे और उनके मिलन को कोस रहा है।
कब हो फिर मिलाप…….
भीगा मन भी सोच रहा है…..
