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मस्ती भरा रिश्ता

अर्णव और मायरा की नोकझोंक और प्यार को दर्शाता खुशहाल भारतीय दंपति का दृश्य

रुचि अग्रवाल, सिलीगुड़ी (पश्चिम बंगाल)

कुछ रिश्ते बड़े गंभीर होते हैं, कुछ बेहद शांत। लेकिन कुछ रिश्ते ऐसे भी होते हैं, जिनमें प्यार के साथ-साथ शरारतों का ऐसा मसाला मिला होता है कि हर दिन किसी कॉमेडी शो से कम नहीं लगता। ऐसा ही रिश्ता था अर्णव और मायरा का।

इन दोनों का प्यार जितना गहरा था, उनकी नोकझोंक उससे कहीं ज्यादा मशहूर थी। घर में एक दिन भी ऐसा नहीं गुजरता था, जब दोनों एक-दूसरे को परेशान न करें।

सुबह-सुबह मायरा बड़े आराम से अपने बाल संवार रही होती, तभी पीछे से दबे पाँव आकर अर्णव उसके बालों में हाथ फेर देता। सारी मेहनत एक सेकंड में बर्बाद!

“अर्णव! अभी-अभी तो बाल बनाए थे मैंने!”

और जवाब में अर्णव की वही शरारती हँसी—

“अरे, बिखरे बालों में ज्यादा अच्छी लगती हो।”

मायरा भी कहाँ हार मानने वाली थी। एक दिन अर्णव नहाकर निकला ही था कि उसने पीछे से उसका तौलिया खींच दिया। बेचारा अर्णव घबराकर उछल पड़ा और मायरा हँस-हँसकर दोहरी हो गई।

रसोई भी इनकी शरारतों से अछूती नहीं थी।

जब मायरा सब्जी बनाती, अर्णव पीछे से आकर उसका चम्मच छीन लेता, कभी गैस बंद कर देता, तो कभी पूछता—

“आज खाने में क्या है?”

“सब्जी।”

“कौन-सी?”

“जो बनी है, वही।”

“नाम तो बताओ।”

“तुम खाकर पहचान लेना।”

और एक दिन तो मायरा ने बदला लेने के लिए सब्जी में मिर्च थोड़ी ज्यादा डाल दी।

पहला कौर खाते ही अर्णव की आँखों से पानी निकल पड़ा।

“ये सब्जी है या अग्निपरीक्षा?”

मायरा मुस्कुराकर बोली—

“आज प्यार थोड़ा तीखा हो गया है।”

ब्रश करते समय भी दोनों चैन से नहीं रहते थे। अर्णव जैसे ही ब्रश करता, मायरा नल का पानी उसकी तरफ उछाल देती। जवाब में अर्णव टूथपेस्ट की हल्की-सी बिंदी उसकी नाक पर लगा देता।

चार्जर तो मानो इनके रिश्ते का सबसे बड़ा युद्धक्षेत्र था।

“मेरा चार्जर कहाँ है?”

“मुझे क्या पता?”

“मायरा!”

“अर्णव!”

और फिर पूरे घर में ‘चार्जर खोजो अभियान’ शुरू हो जाता। बाद में पता चलता कि चार्जर किसी तकिए के नीचे छिपा हुआ है।

फोन पर बात करते समय तो दोनों की शरारतें चरम पर पहुँच जाती थीं।

अगर मायरा अपनी सहेली से बात कर रही हो, तो अर्णव पीछे से आकर गुदगुदाने लगता।

“अर्णव… रुको… हाहाहा…”

उधर सहेली पूछती—

“क्या हुआ?”

मायरा झेंपकर कहती—

“कुछ नहीं, घर में एक बहुत बड़ा बच्चा है।”

और जब अर्णव किसी से फोन पर गंभीर चर्चा कर रहा होता, तब मायरा पीछे से अजीब चेहरे बनाकर उसे हँसाने की कोशिश करती। कभी कान खींच देती, कभी आँख मारती, कभी धीरे से गाना गुनगुनाने लगती।

कई बार तो दोनों पुरानी बातों को पकड़कर घंटों एक-दूसरे की खिंचाई करते।

“याद है, पहली बार तुमने चाय बनाई थी?”

“हाँ, तो?”

“चाय कम, गरम पानी ज्यादा था।”

“और तुम्हें याद है, पहली बार तुमने खाना बनाया था?”

“क्या?”

“कुत्ते ने भी सूँघकर छोड़ दिया था।”

बस फिर क्या था, हँसी के फव्वारे छूट पड़ते।

कभी तकिए की लड़ाई, कभी रिमोट की छीना-झपटी, कभी आखिरी समोसे पर अधिकार की जंग, तो कभी बिना वजह एक-दूसरे को चिढ़ाने का कार्यक्रम। देखने वालों को लगता कि शायद दोनों हर समय लड़ते रहते हैं, लेकिन सच तो यह था कि यही उनकी मोहब्बत की भाषा थी।

उनके रिश्ते में गुलाब भी थे और शरारतें भी। शिकायतें भी थीं और खिलखिलाहटें भी। दोनों जानते थे कि जीवन की जिम्मेदारियाँ कभी खत्म नहीं होंगी, इसलिए उन्होंने तय कर लिया था कि हर दिन में थोड़ा-सा बचपना, थोड़ी-सी मस्ती और ढेर सारी नोकझोंक जरूर घोलेंगे।

क्योंकि कुछ रिश्ते सिर्फ प्यार से नहीं चलते, उन्हें जिंदा रखने के लिए हँसी, शरारत और एक-दूसरे को बेवजह परेशान करने की कला भी जरूरी होती है।

और अर्णव-मायरा का रिश्ता इसी कला का सबसे खूबसूरत उदाहरण था—एक ऐसा नटखट रिश्ता, जिसमें हर नोकझोंक के पीछे छिपा था ढेर सारा प्यार।

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