अनुपमा जैसी दोस्त ने मुझे बनाया लेखिका

अपनी सहेली को लेखिका बनने की प्रेरणा देती दोस्त अनुपमा की भावुक कहानी कुछ दोस्त आपकी ज़िंदगी नहीं, आपकी पहचान बदल देते हैं।

रेणु फ्रांसिस, इंदौर

आज मैं लेखिका हूँ तो उसकी वजह मेरी दोस्त अनुपमा है। हमारी दोस्ती स्कूल से लेकर कॉलेज तक रही। वह बहुत अच्छी चित्रकार थीं और सभी उसकी तारीफ़ करते थे। मैं अक्सर अपनी कॉपी के पिछले पन्नों पर छोटी-छोटी शायरियाँ या कहानियाँ लिखती थी। वह हमेशा मुझसे कहती, “तू अच्छी कहानियाँ लिखती है। अपनी प्रतिभा को आगे बढ़ा। अपनी रचनाएँ अखबारों में भेजा कर। तेरा नाम भी होगा और पैसे भी मिलेंगे।”

लेकिन मैं संकोची स्वभाव की थी, इसलिए कॉपी के पन्नों से आगे कभी लिख नहीं पाई। आखिर उसने मेरी प्रतिभा को आगे लाने का निश्चय किया। उसने मुझसे एक छोटी-सी बात पर लड़ाई कर ली और मेरे साथ कॉलेज आना-जाना बंद कर दिया। यहाँ तक कि उसने मुझसे बात करना भी बंद कर दिया। उसने कहा, “जब तक तू अपनी कहानी लिखकर अखबार में नहीं भेजेगी, तब तक मैं तुझसे बात नहीं करूँगी।”

हम साथ कॉलेज आते-जाते थे, साथ खाना खाते थे। आखिर हम पड़ोसी भी जो थे। हम दोनों का मन नहीं लग रहा था। इसी वजह से वह बीमार पड़ गई। मैं उसे देखने गई और अपनी लिखी हुई कहानी कागज़ पर लेकर गई। मैंने वह कहानी उसके हाथों में थमा दी।

कहानी पढ़कर वह इतनी खुश हुई कि बोली, “मेरी तबीयत तो तुझे देखकर ही ठीक हो गई थी। मैं तो बस तेरे अंदर के संकोची मन को हराना चाहती थी। तेरी कहानियाँ कॉपी के पिछले पन्नों पर नहीं, बल्कि अखबारों और पत्रिकाओं में छपें, यही मेरी इच्छा थी, क्योंकि तेरे भीतर एक कहानीकार छिपा था। बस उसे बाहर निकालना था।”

उसने मेरी कहानी को लिफाफे में रखकर अखबार के कार्यालय में पोस्ट कर दिया। ठीक एक महीने बाद जब मेरी कहानी अखबार में छपी, तो सबसे पहले वही सुबह-सुबह मेरे घर आई। उसने मुझे और पूरे मोहल्ले को वह अखबार दिखाया। हालांकि वह एक छोटा-सा अखबार था, लेकिन उसमें अपने नाम के साथ ‘कहानीकार रेणु’ छपा देखना मेरे लिए किसी सपने के सच होने से कम नहीं था।

वाकई, वह मेरी सच्ची दोस्त थी, जिसने मेरी प्रतिभा को पहचाना और मुझे लेखिका बनाया। आज वह इस दुनिया में नहीं है, लेकिन जब भी मेरी कोई रचना किसी अखबार या मैगज़ीन में छपती है, तो आँखों के सामने मेरी दोस्त का चेहरा आ जाता है और मेरी आँखें नम हो जाती हैं।

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