
डॉ. संजुला सिंह संजू
गुरु ज्ञान का दीप है
और ज्ञान का है भंडार ।
कितनी भी मुश्किल आए
गुरु भव से लगा दे पार ॥
गुरुदेव तुम्हारा अभिनंदन
गुरुदेव तुम्हारा हे वंदन -2 ।
मैं वारी हूं तुम चंदन हो
हर घड़ी हर पल तेरा वदन हो
तेरे चरणों में शीश नवाऊं मैं
गुणगान सदा तेरा गाऊं मैं
गुरुदेव तुम्हारा अभिनंदन
गुरुदेव तुम्हारा है वंदन ॥
मेरी नाव के तुम पतवार गुरु
तुमसे होती मेरी खुशियां शुरू
मेरे माथे के सरताज हो तुम
मेरे जीवन का आधार हो तुम
गुरुदेव तुम्हारा अभिनंदन
गुरुदेव तुम्हारा है वंदन ॥
मैं धागा तुम हो फूल गुरु
मेरी गलती जाते भूल गुरु
तुम उर से मुझको लगाते हो
सही राह सदा दिखलाते हो
गुरुदेव तुम्हारा अभिनंदन
गुरुदेव तुम्हारा है वंदन ॥
मैं पतित हूं तुम बड़े पावन हो
गुरुदेव बड़े मन भावन हो
मैं मूढ़ मति अज्ञानी बड़ी
तुम तो बड़े ही सदज्ञानी हो
गुरुदेव तुम्हारा अभिनंदन
गुरुदेव तुम्हारा है वंदन ॥
मेरे अंधियारे हृदय में सदा
तूने ज्ञान का दीप जलाया है
कृपा करके मेरे चित से गुरु
अज्ञानता दूर भगाया है
गुरुदेव तुम्हारा अभिनंदन
गुरुदेव तुम्हारा है वंदन ॥
तुम रखते सदा मेरा ध्यान गुरु
हर जगह दिलाया मान गुरु
मैं भटकूं जो अगर राह कभी
तुम थामना मेरी बांह गुरु
गुरुदेव तुम्हारा अभिनंदन
गुरुदेव तुम्हारा है वंदन ॥
संजू करती अरदास गुरु
तेरे नाम की सदा रहे प्यास गुरु
तेरे चरणों में शीश नवाती हूं
मैं खुद को समर्पण करती हूं ।
गुरुदेव तुम्हारा अभिनंदन
गुरुदेव तुम्हारा है वंदन ॥
