
पूनम सिंह वत्सला, जमशेदपुर
हुआ कुटुंब में बेटी का जन्म,
चारों ओर खुशियाँ ही खुशियाँ थीं।
हो रही थी चर्चा उस दिव्य कन्या की,
मुख पर जिसकी अनुपम आभा थी।
माँ बड़े ही लाड़ से
करती उसका खूब दुलार।
देखते ही देखते समय बीता,
बेटी हो गई अठारह पार।
अब माँ को होने लगी चिंता,
बेटी जाएगी दूसरे घर।
कहती हैं वे पिता से,
“ढूँढ़िए इसके लिए कोई योग्य वर।”
मुस्कुराकर पिता कहते हैं,
“बेटी तो होती है पराया धन।
लेकिन वह सुरभित करती है
एक नहीं, दो-दो आँगन।”
फूलों की सुगंध की तरह
महकती है बेटी का जीवन।
कभी इस आँगन की खुशबू बनती है,
तो कभी उस आँगन का बनती है दर्पण।
फिर क्यों तुम इतना सोचती हो,
मन को व्यर्थ पीड़ा देती हो?
बेटी पराया धन सही,
पर पिता के हृदय की जान होती है।
बेटी वह चाँद है,
जो हर घर को अपनी रोशनी से जगमगा देती है।
बेटी घर की रौनक होती है,
उसकी किलकारियों से खुशियाँ गूँज उठती हैं।
बेटी बहुत नसीब वालों को मिलती है,
जीवन की सबसे प्यारी सौगात होती है।
बेटी ईश्वर का अनुपम आशीर्वाद है,
घर की देहरी का सम्मान होती है।
अपने आँगन की लक्ष्मी स्वरूप,
हर परिवार की पहचान होती है।
