
अपेक्षा व्यास, भीलवाड़ा (राजस्थान)
“मंगल गीतों की धुन गोधूलि के आँचल को सुरों से सजा रही थी।” बारी-बारी से महिलाएँ आतीं और घूँघट में दमकते मुखड़े को देखकर बलैयाँ लेतीं।
तभी कमला काकी सा ने कहा, “अरे शांता! तेरी बहू तो चाँद का टुकड़ा है। ज़रा काला टीका लगाकर इसकी नज़र उतार देना।”
इतना कहते ही ठहाकों की आवाज़ से घर-आँगन गूँज उठा।
देखते ही देखते समय बीत गया। सास-बहू के रिश्ते की परिभाषा प्रेम ने बदल दी।
एक दिन अचानक सुशील ने कहा, “माँ! ऑस्ट्रेलिया से जॉब ऑफर आया है।”
दरवाज़े की ओट से बहू रीना यह सुनकर खुश हो रही थी, पर उसे क्या पता था कि यही उसकी खुशियों का अंत होगा।
बहुत समय बीत गया। तभी सुशील का आख़िरी फ़ोन आया।
“माँ! मैंने दूसरी शादी कर ली है। तलाक़ का नोटिस भेज रहा हूँ।”
जैसे रीना का तो संसार ही उजड़ गया। पर शांता ने हिम्मत नहीं हारी।
उसने रीना से कहा, “उस कलंकित बेटे से तो अच्छा है कि तू मेरी बहू है।”
“आज से हम एक नया रिश्ता जोड़ेंगे—माँ-बेटी का रिश्ता।”
“चल रीना, कोर्ट चलते हैं। सारी वसीयत जो तेरे नाम करनी है।”
