बारिश की बूंदें

बारिश की बूंदें: धरती और आकाश के प्रेम का अद्भुत काव्य

मोनिका राय, लखनऊ

बारिश की बूंदें
सूखी पड़ी धरती पर
कुछ यूँ गिरीं,
मानो बंजर पड़ी स्त्री के
सीने में किसी ने
प्रेम भर दिया हो।
आग से तपते हृदय में
कोई ठंडक दे गया हो।

आसमान रूपी प्रेमी,
नदी के दो किनारों से
जिसे रोज़ देखती तो है,
मगर मिल नहीं पाती,
न ही मिलने के आसार हों,
प्रेम-पत्र भेज दिया हो
और प्रेमिका प्रेम-भरे
संदेश में भीगती जा रही हो।

बारिश की बूंदें
धरती को कुछ यूँ
आगोश में भरती हैं,
जैसे सारा वात्सल्य
बह सा जाए,
स्वयं में कुछ यूँ समाएँ,
जन्मों तक कभी
न बिछड़ पाएँ।

लिपटकर कुछ यूँ रोई,
जन्म-जन्म का
रुका सैलाब
सारे बंधन तोड़
टूटकर बह गया हो।
दोनों पर असर
कुछ यूँ हुआ,
समाए हों एक-दूजे में,
एक-दूजे के हो गए हों।
कभी मिट्टी, कभी पानी हो,
कभी पानी, कभी मिट्टी हो गए हों।

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