
डॉ सोनिया अक्स, पानीपत
दुनिया की चाल ढाल बड़ी बा कमाल हैं
हर सु हर इक सिम्त ही फैला वबाल है
कैसे कहूं कि क्या क्या गुज़रती क़ल्ब पर
मुश्किल बहुत ही अब तो यहां अर्ज़ ए हाल है
दुनिया कमाल है बड़ी दुनिया कमाल है
झूट ओ दगा में आज यह आगे निकल गयी
झपकी न थी निगाह की पल में बदल गयी
मेरी नज़र में दुनिया की इतनी बिसात है
जैसे कि कोई चीज़ नज़र से फिसल गई
है इक तिलिस्म झूट का इक माया जाल है
दुनिया कमाल है बड़ी दुनिया कमाल है
एटम बमों से लैस से दुनिया की सरहदें
इंसानियत की लाश पे पांव यह खुरदुरे
सबको यही गुमान कि हम ही महान हैं
आदम की ज़ात देखके ये बे ज़ुबान है
धरती की गोद ख़ून से अब लाल लाल है
दुनिया कमाल है बड़ी दुनिया कमाल है
हर सु क़त्ल ए आम मुहब्बत का हो गया
मंज़र यह आज एक क़यामत का हो गया
न प्यार भाई चारा न उल्फ़त न दोस्ती
क्या हाल देखिए कि शराफ़त का हो गया
एक गीत बज रहा है न सुर है न ताल है
दुनिया कमाल है बड़ी दुनिया कमाल है
मैं चाहती हूँ कि जन्नत हो यह जहां
गुलज़ार हो ज़मीन खिले फ़िर यह गुलसिताँ
इन वादियों में फूल मुहब्बत के खिल उठें
वो अब्र बरसे प्यार के सैराब जिस्म हों
उल्फ़त की गूंज सारे जहां को सुनाई दे
बस इस ज़मीं पे दोस्तों जन्नत दिखाई दे
सर को झुका के मेरा यही बस सवाल है
दुनिया कमाल है बड़ी दुनिया कमाल है
