उम्मीदों का उज़ास

अस्पताल के बिस्तर पर लेटे वृद्ध पिता को गले लगाते उनके बेटे, पास खड़ी भावुक माँ और बेटी—पारिवारिक प्रेम, पश्चाताप और नई उम्मीद का भावनात्मक दृश्य।

रेणु गुप्ता, जयपुर

“शांत हो जाओ जी। दोनों को माफ कर दो। अपने ही बच्चे हैं। अपने दिल पर मत लो उनकी नादानी। मैं आपके हाथ जोड़ूँ, माफ कर दो उन्हें। यूं उनकी सोच-सोच कर हलकान मत हो।”

गुंजा ने बिस्तर पर पड़े अवश बेचैनी से अपना एक पांव बार-बार पटकते अपने लकवाग्रस्त पति जगन से कहा, लेकिन जीवन-संगिनी के मृदु, आद्र स्वर सुन कर भी जगन की बेकली कम नहीं हुई। उसकी बेचैनी थमने का नाम नहीं ले रही थी।

आंसुओं से लबालब आँखों में पुरानी स्मृतियों की कश्तियाँ डूबने उतराने लगीं।

ज़िंदगी ने कदम-कदम पर उसका कड़ा इम्तिहान लिया था।

उसने एक धनाढ्य परिवार में तीन भाइयों में सबसे छोटी संतान के रूप में आँखें खोली थीं। अम्मा-बाबूजी के साथ-साथ दोनों बड़े भाइयों की आँखों का तारा था वह। बचपन में मिले अथाह लाड़-प्यार ने उसके व्यक्तित्व को गैर-जिम्मेदार और अकर्मण्य बना दिया था। तनिक बड़े और समझदार होने पर जब भी कोई जिम्मेदारी वाला काम करने को उद्यत होता, दोनों भाई उसे उससे यह कहते हुए विमुख कर देते, “अरे, यह हम कर लेंगे। तू तो अपनी पढ़ाई में मन लगा। तेरे अभी खेलने-खाने के दिन हैं।”

उसके प्रति दादा-दादी और माँ का भी हमेशा यही रवैया रहता। पिता ही एकमात्र इंसान थे जो

ज़िंदगी की दुरूह वास्तविकता समझते थे। जब भी मौका लगता, वे उसे समझाते, “बेटा, तू अब छोटा नहीं रहा। पढ़ाई के साथ-साथ थोड़ा काम पर भी ध्यान दे। जब तक हम हैं, तुझे किसी चीज की कमी नहीं होने देंगे, लेकिन कभी न कभी हमारी आँखें बंद होने पर तू क्या करेगा। सब को अपनी लड़ाई खुद ही लड़नी पड़ती है। किसी भी दूसरे की बैसाखियों पर ज़िंदगी के फ़ासले नहीं नापे जाते बेटा। कॉलेज के बाद थोड़ा समय दुकान पर भी बैठा कर, जो व्यापार पर तेरी पकड़ बने। अपने दम पर कुछ कर सके। कोई तुझे ज़िंदगी भर बैठा कर नहीं खिलाने वाला। वो चाहे भाई हो या बहन।”

लेकिन तब उसे पिता की यह समझाइश जहर लगा करती, और वो उनकी बात कंधे उचका कर मुस्कुराते हुए हवा में उड़ा टाल देता।

वह एक आजाद परिंदा था। दुनियादारी में नितांत कोरा और अनाड़ी। उसके लिए ज़िंदगी बस कॉलेज जाना, प्रेयसी गुंजा के साथ समय बिताना, क्रिकेट मैच खेलना और दोस्तों के साथ अड्डेबाजी से अधिक न थी। क्रिकेट में उसकी जान बसती थी। अपने मोहल्ले की क्रिकेट टीम का कैप्टेन था। वह एक सिद्धहस्त बैट्समैन था। प्रतिपक्षी टीम की लगभग हर कमजोर बॉल पर चौके-छक्के जड़ने में उसे महारथ था। जब भी पिच पर बैटिंग कर रहा होता, अपना सपना जीते हुए वह एक अद्भुत खुमार में डूब जाता। अपने बढ़िया खेल के दम पर वह अपने स्कूल और कॉलेज की टीम का कैप्टेन भी था।

चौकों-छक्कों की बरसात कर वह एक अनोखी उपलब्धि के एहसास से भर उठता। दर्शकों की तालियाँ सुन कर उसे अपने ऊपर गर्व होता। खेलते वक़्त दर्शकों में बैठी गुंजा जब उनके चौकों-छक्कों की तारीफ़ में जुगनुओं सी चमकती आँखों से उसके पूरे वज़ूद को सहलाती, तालियाँ बजाती, ज़िंदगी में और कोई चाहत, कोई तमन्ना नहीं बचती।

जब उसकी धुआँधार बैटिंग के दम पर जीतने वाली उसकी टीम के खिलाड़ी उसे अपने कंधों पर बैठा हर्षोल्लास से चीखते-चिल्लाते खेल के मैदान का चक्कर काटते, उसे लगता, उस की ज़िंदगी का मकसद पूरा हो गया।

यूं ही, गुंजा के साथ फ़ुल टाइम रोमांस, क्रिकेट, कॉलेज और दोस्तों के साथ बेफिक्री के आलम में उस का वक़्त बीत रहा था।

पत्नी गुंजा एक कंगाल, विधवा माँ की बेटी थीं। बेटी के हाथ पीले कर गंगा नहाने की महत अभिलाषा के चलते उसकी सासू माँ ने आज से करीब पचास दशक पहले महज़ अट्ठारह बरस की कच्ची उम्र में बेटी का गठजोड़ उससे करवा कर चैन की सांस ली। यह भी न देखा कि उसकी कमाई का कोई नियमित जरिया नहीं है। बस अच्छा, नामी घर-खानदान देख कर बेटी को उसकी ज़िंदगी में शामिल कर दिया।

लेकिन ज़िंदगी का ताना-बाना मात्र मौज-मस्ती और प्यार-मोहब्बत के धागों से बुना होता तो उस की ज़िंदगी की कहानी का अवसान त्रासद न होता।

उसके जवानी के जो दिन घर भर के भरपूर लाड़-प्यार, क्रिकेट और रोमांस के पंखों पर सवार हवा की गति से बीते थे, वो ही समय बीतते-बीतते जिम्मेदारियों के बोझ तले उसके पांवों की बेड़ियाँ बन उसे रसातल की राह दिखाने लगे।

उसकी ज़िंदगी में गुंजा के शामिल होने के बाद एक-एक कर दो बेटे और एक बेटी आए। उसके साथ आई थीं अनगिनत जिम्मेदारियाँ। पाँच सदस्यों के परिवार की रोज की जरूरतों को पूरा करने के लिए रुपयों-पैसों की आवश्यकता थी लेकिन उसके हाथों में तो बस चौके-छक्के जड़ने का हुनर था। बड़े दो भाइयों की तरह पुश्तैनी तेल की दुकानों को संभालने का रत्ती भर भी कौशल न था।

दोनों भाइयों का विवाह हुए बरसों बीत चले। पिता की वृद्धावस्था के चलते व्यापार और दुकान की सत्ता अब दोनों भाइयों के मजबूत हाथों में आ गई और गृहस्थी की लगाम दोनों भाभियों के हाथों में। उसका अपना पाँच सदस्यों का कुटुंब समय बीतते-बीतते दोनों भाभियों के तायनों और उलाहनों का केंद्र-बिन्दु बनता जा रहा था।

भाभियों के साथ भाइयों की नजरें भी पलटने लगी थीं। बड़े होते अपने बच्चों की जरूरतों के आगे उसकी और उसके बच्चों की आवश्यकताऐं गौण हो उठी थीं। वैसे भी अपनी बीवी-बच्चों का पेट काट कर कौन भाई और उसके परिवार का पेट पालता? सो इस मुद्दे पर घर में सतत कलेश रहने लगा।

वह जो कभी बड़े भाइयों की आँखों का तारा था, वही अब उनकी आँखों की किरकिरी बन गया था।

इस गृह-कलह की परिणति हुई उसकी और उसके परिवार के गृह-निर्वासन से।

पिता की मृत्यु होते ही उसके दोनों बड़े भाई उनकी जायदाद का बंटवारा कर अपने-अपने हिस्से में तेल की एक-एक सोना उगलती दुकान लेकर अलग हो गए। लोक-लाज के भय से उन्होंने उसे मात्र एक घर देकर उससे अपना पिंड छुड़ा लिया।

पाँच प्राणियों के लिए रोटी और कपड़े का जुगाड़ कोई खेल नहीं। वक्त के साथ उस की तंगहाली बढ़ती गई। दोनों पति-पत्नी ने सलाह कर घर के एक हिस्से को किराये पर चढ़ा दिया। अब उसका किराया उनकी आमदनी का एकमात्र साधन था लेकिन तीन बच्चों की पढ़ाई और दस अन्य खर्चे उससे पूरे नहीं हो पाते। सो गुंजा पास के लहंगा-चोली की फैक्ट्री से कपड़ों की सिलाई का काम ले आती और दिन रात उसमें लगी रहती।

वह भी छोटी-मोटी नौकरी से कुछ आमदनी करने की कोशश में लगा रहता लेकिन उसकी नौकरी उसके काम में अनाड़ीपन से आए दिन छूट जाती।

समय का चक्र उत्तरोत्तर आगे बढ़ता गया।

जगन के दोनों बेटे जतिन और नरेन जवान हुए लेकिन दोनों ही ज़िंदगी में पिता के पदचिह्नों पर चलते हुए कोई अच्छा मुकाम हासिल नहीं कर पाए। मात्र बीए कर छोटी-मोटी नौकरी में लग गए। अलबत्ता उनकी बड़ी बेटी अच्छा-खासा पढ़-लिख कर बैंक की नौकरी में आ गई।

समय के साथ उसके पुश्तैनी मकान के आसपास का एरिया बहुत बढ़िया विकसित हो गया और उसकी कीमत करोड़ों में पहुँच गई।

अब दोनों भाई उन दोनों के बीच पुश्तैनी मकान के बँटवारे और बेचने की मांग करते हुए आए दिन उससे लड़ते और घर में तांडव मचाते।

सीधा-सादा जगन समझ न पाता दोनों के पालन-पोषण में उससे कहाँ कोताही हुई। वह और गुंजा घर को बेचने के पक्ष में कतई न थे। उसका घर उसका और गुंजा का एकमात्र ठौर था।

घर में दिन-रात कलह-कलेश का असर उसकी सेहत पर होने लगा था। एक दिन दोनों बेटों ने उससे लड़ते हुए उसे खूब खरी-खोटी सुनाई और उसी रात को उसके शरीर के आधे हिस्से को लकवा मार गया।

उसे अस्पताल ले जाया गया।

तभी लाड़ली बेटी निरुपमा के उसे पुकारने पर वह अतीत के गलियारों से वापस आया।

उसकी सबसे बड़ी बेटी निरुपमा अस्पताल आ पहुंची थी। उसने उसे बेचैनी से छटपटाते देखा तो पहले तो दोनों छोटे भाइयों को कुछ लताड़ा कुछ समझाया। फिर उनसे वायदा लिया कि वे अब कभी मकान के बँटवारे और उसे बेचने की मांग को अपनी जुबान पर कभी नहीं लाएंगे। अपनी-अपनी नौकरी में बहुत लगन से मेहनत करेंगे और उसमें ऊपर उठने की भरसक कोशिश करेंगे। अब से यही उन दोनों की ज़िंदगी का मकसद होगा और फिर उसने पिता के हृदय पर हाथ रख कर उन्हें तसल्ली देने की कोशिश की।

“पापा… शांत हो जाओ। दोनों भाइयों को माफ़ कर दो। दोनों नादान हैं। समझ नहीं पा रहे, वे क्या कर रहे हैं? प्लीज़ पापा, उनकी बातें दिल पर मत लो। मैंने इन दोनों से वायदा लिया है, अब कभी ये मकान बेचने की बात को लेकर आपसे कभी नहीं लड़ेंगे और अपने-अपने काम में कड़ी मेहनत करेंगे।”

दोनों भाई सर झुकाए, मुंह लटकाए सामने ही बैठे थे। खून आखिर खून ही होता है। दोनों ही पिता से किए कलह-कलेश पर शर्मिंदा थे। पिता को इस हालत में दुख पाते देख वे दोनों ही घोर अपराध-भाव से भर उठे थे। दोनों के ही मन में मंथन चल रहा था, ‘हमारी वजह से ही आज पिता बिस्तर से लग गए। इतना कष्ट पा रहे हैं। हमने इन्हें बहुत दुःख दिए।”

तभी बड़ा भाई उठा और पिता के पांव दबाने लगा। छोटा भाई भी उसकी देखा-देखी उनके लुंज-पुंज हाथ को सहलाते हुए भीगी आँखों और भर्राये गले से बोल पड़ा, “पापा… हमें माफ कर दो। अब कभी आपसे नहीं लड़ेंगे। अपने काम में अपनी जान लगा देंगे। ये हमारी प्रौमिस है आपसे।”

“हाँ पापा… वायदा है आपसे… अब कभी घर के बँटवारे और उसे बेचने की बात हमारी जुबान पर नहीं आएगी। आपकी कसम। अपनी-अपनी नौकरी में आगे बढ़ने की जी-तोड़ कोशिश करेंगे हम। हमने दीदी से प्रौमिस की है। आप बस ठीक हो जाओ। और हमें कुछ नहीं चाहिए।” कहते हुए बड़े बेटे ने नम आँखों से पिता के पैरों में अपना सर रख दिया।

यह देख झर-झर आँसू बहाती माँ ने पति से कहा, “माफ कर दो जी। बच्चों से नादानी हो जाती है। हम बड़ों का काम है उन्हें माफ करना। आप भी शांत हो जाओ।”

पिता ने अपने स्वस्थ हाथ से इशारा कर दोनों बेटों को अपने कलेजे से लगने का इशारा किया।

अगले ही पल दोनों बेटे पिता के सीने से लग गए।

एक सप्ताह अस्पताल में रहने के बाद पिता घर वापस आ गये।

पिता को हमेशा के लिए खो देने के खौफ से दोनों बेटों की काया पलट हो गयी थी।

बहुत सोच-विचार के बाद बेटों ने निर्णय लिया कि वे दोनों कागज़ के बैग बनाने का काम करेंगे क्यों कि दोनों ही बेटे एक रईस सेठ के पेपर बैग बनाने की औद्योगिक इकाई में कुछ समय के लिए काम कर चुके थे। इस काम की बारीकियों से परिचित थे। गुंजा और जगन ने भी इसके लिए सहमति दे दी।

अब समस्या यह थी कि इस काम की शुरुआत करने के लिए पंद्रह-बीस लाख रुपयों की जरूरत थी जिसे जुटाना टेढ़ी खीर थी।

निरुपमा के प्राइवेट कंपनी में मार्केटिंग एग्जीक्यूटिव पति निहाल ने उन्हें सलाह दी कि उनके घर को बैंक के पास गिरवी रख कर वे बीस लाख का लोन बड़ी आसानी से वहाँ से प्राप्त कर सकते हैं।

निरुपमा ने पिता से कहा, “पापा, लोन तो मैं अपने बैंक से दिलवा दूंगी लेकिन मुझे बस यही टेंशन है कि ये दोनों पूरी मेहनत से काम कर पायेंगे या नहीं। एक बार अपना घर गिरवी रखवा दिया और ये दोनों उसकी किश्तें नहीं चुका पाए तो अपना घर डूब जाएगा। नहीं, नहीं, हम ये रिस्क नहीं ले सकते। मैं ऐसा करती हूँ, अपनी सेविंग से मैं बीस लाख रुपये दोनों को उधार दे देती हूँ। निहाल थैलों की मार्केटिंग का काम कर लेंगे। मैं भी फैक्ट्री पर सुबह-शाम पूरी नज़र रखूंगी।”

“निरुपमा, बेटा, मुझे तुझसे उधार लेना कुछ ठीक नहीं लग रहा। ये दोनों ढंग से काम नहीं कर पाए तो तेरी पूंजी डूब जायेगी बेटा। बीस लाख कोई छोटी रकम नहीं होती। ना, ना, कुछ और सोच।”

“दूसरा उपाय है, मैं अपने नाम से अपने बैंक से बीस लाख का लोन ले लूं और ये दोनों उसकी किश्तें धीमे-धीमे चुका दें।”

“हाँ, ये ठीक रहेगा। तू अपने नाम से बैंक से लोन ले ले और ये दोनों उसे चुका दें।” फिर गुंजा ने पति से पूछा, “क्यों जी, ये ठीक रहेगा ना?”

पति ने अपने स्वस्थ हाथ से इशारा कर इसके लिए अपनी सहमती जताई।

“ओके, फिर मैं लोन के लिए आज ही अप्लाई करती हूँ।”

समय का परिंदा अथक उड़ता गया।

निरुपमा का बैंक का लोन स्वीकृत हो गया और नियत वक़्त पर उसे मिल भी गया।

आज कागज़ के थैले बनाने की सारी मशीनें आई हैं।

जतिन और नरेन् भी बहुत खुश हैं। पिता से किया वायदा जो निभाना है।

कोई भी काम करना आसान नहीं। फैक्ट्री के लिए आवश्यक शुरुआती कागजी कार्यवाही, मशीनें और कच्चा माल जुटाने और प्रशिक्षित कामगारों की व्यवस्था करने में छह माह लग गए। दोनों भाइयों पर नया काम करने का उछाह तारी है, लेकिन ऐसे कामों में मात्र उत्साह कारगर नहीं होता। अनेक शुरुआती समस्याएं आईं, लेकिन निरुपमा और निहाल के सहयोग और जतिन नरेन् की कड़ी मेहनत के दम पर थैले बनने का काम शुरू हुआ और निहाल ने थैलों की मार्केटिंग की।

सबसे अहम् बात थी, पिता की बीमारी ने दोनों जतिन और नरेन् को बुरी तरह से हिला दिया था। दोनों ही अपराध-भाव से ग्रस्त थे कि पिता की ये हालत उनकी वज़ह से हुई थी। सो दोनों भाई पिता के समक्ष अपने-आप को प्रूव करने के जज़्बे से लबरेज़ थे सो दोनों ने ही अपने आप को काम में पूरे समर्पण से डुबो दिया था।

उनकी मेहनत रंग लाई।

समय के साथ थैलों की पहली खेप की सप्लाई मार्केट में हुई।

आज पहली खेप के पेमेंट की रकम कुछ हज़ारों में आयी है। घर भर में खुशी की लहर दौड़ गयी। नरेन् और जतिन ने पूरी पेमेंट की रकम लाकर पिता को दी। पिता ने डबडबाई आँखों से अपने तीनों बच्चों और दामाद निहाल को अपने सीने से लगा लिया। गुंजा भी अपने बच्चों की इस नायाब कामयाबी पर भाव-विभोर थी।

अपनी छोटी सी हँसती-चहकती फुलवारी देख जगन की बुझी-बुझी आँखें उम्मीदों के उजास से चमक उठीं।

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