निःस्वार्थ प्रेम

सुबह की सुनहरी रोशनी में हाथ में चाय का प्याला लिए एक भारतीय महिला खिड़की के पास खड़ी है। बाहर ओस से भीगे फूल, दूर पहाड़ और बहता झरना दिखाई दे रहा है। वातावरण शांत, आत्मचिंतन और निःस्वार्थ प्रेम का प्रतीक है।

रीता मिश्रा तिवारी, भागलपुर (बिहार)

स्त्रियाँ भूल जाती हैं
पिछले दिनों की बातें, गुज़री रातों की चुभन।

हर सुबह जागती हैं, किंतु
अब कोई भागमभाग नहीं है।

आराम से बिना शक्कर की एक प्याली चाय में
चुटकी भर नमक मिलाकर पी जाती हैं।

हर घूँट के साथ विचार करती हैं—
समंदर का विस्तार होना ज़रूरी था
या नदी का साथ?

स्त्रियाँ उड़ा देती हैं
जीवन की कड़वाहट को
रसोई के काले धुएँ में।

संवरती नहीं हैं।
आईने के सामने खड़ी होकर
हिसाब लगाती हैं
देह पर धरे लाल, पीले और सफेद रंगों का।

वे भूल जाती हैं
सर पर पल्लू रखकर, बाँहें पसारे
सावन की बूँदों का इंतज़ार करना।

देखती हैं
अंबर से उतरते सूरज को,
कोमल पंखुड़ियों पर बिखरी ओस की बूँदों को।

स्त्रियाँ बचा लेती हैं
भागे हुए प्रेम के पदचिह्नों को
और उतार फेंकती हैं,
जूड़े में लपेटकर बंधनों को।

याद रखती हैं केवल
सबसे ऊँचे पहाड़ पर बैठे प्रेमी के प्रेम को,
पर्वत से गिरते झरने के
निःस्वार्थ प्रेम को।

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